मसीही-कलीसिया-का-इतिहास

मसीही कलीसिया का इतिहास | Christian Church History

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दोस्तों आज हम एक विषय पर चर्चा करेंगे जिसका नाम है मसीही कलीसिया का इतिहास | Christian Church History

मसीही कलीसिया का इतिहास | Christian Church History

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Image by Peter H from Pixabay मसीही-कलीसिया-का-इतिहास

कलीसिया शब्द यूनानी भाषा से आया है जिसे यूनानी में “एक्लेशिया” कहते हैं. एक्लेशिया शब्द को दो भागों में बांटा जा सकता है. एक जिसका अर्थ है बाहर और कैलियो शब्द का अर्थ है बुलाया जाना.

कलीसिया शब्द का अर्थ है उन लोगों का झुण्ड जो संसार में से अलग किए गए हैं. यीशु मसीह ने सिर्फ दो ही बार कलीसिया शब्द का इस्तेमाल किया (मत्ती 16:18, 18:17)

पौलुस ने मुख्य तौर से कलीसिया को “परमेश्वर का घराना नाम दिया. कलीसिया का उदघाटन प्रेरितों के काम अध्याय 2 में पेंतिकोस्त के दिन हुआ. कलीसिया को शुरू हुए लगभग 2000 वर्ष हो गए हैं.

हमें मसीह कलीसिया का इतिहास क्यों सीखना है ?

कलीसिया का इतिहास परमेश्वर की कहानी (His-Story) उसकी कहानी इसलिए हमें यह समझना जरुरी है. वर्तमान मसीही कलीसिया में पाई जाने वाली बहुत सारी बातों का कारण हम तभी समझ पाते हैं. जब हम कलीसिया का इतिहास सीखते हैं.

100 ईस्वी तक – यीशु और प्रेरितों का समय

100 ईस्वी – 321 ईस्वी – क्रूर सताव का समय

312- 590 ईसवी मसीही साम्राज्य का समय

590 -1517 ईसवी -अन्धकारमय मध्यकालीन समय

1517 – 1648 ईसवी – पुन: निर्माण का समय

1648 – 1789 ईसवी – तर्क एवं जागृति का समय

1789 – 1914 ईसवी – बढ़ोतरी का समय

कलीसिया का इसिहास हमें इसलिए समझना चाहिए ताकि हम भिन्न मसीही विभागों की शुरुआत को समझ सकें.

हमसे पहले यीशु मसीह के ऐसे भी योद्धा रहे हैं जिनके त्याग और परिश्रम के कारण यीशु का सुसमाचार यहाँ तक फैला है.

कलीसिया के इतिहास को सीखने से ही हम उन लोगों के धन्यवाद दे सकते हैं, और उन से प्रेरणा पा सकते हैं.

मसीही कलीसिया के इतिहास का विभाजन

100 ईसवी तक यीशु और प्रेरितों का समय

सुसमाचारो में हम यीशु का जन्म, जीवन मृत्यु पुनरुत्थान, स्वर्गारोहण पढ़ते हैं. प्रेरितों के समय में हम प्रेरितों की सेवकाई पढ़ते हैं जिनकावर्णन निम्नलिखित हैं.

पतरस – पुन्तुस, गलातिया कप्दुकिया, आसिया, बिथुनिया (1 पतरस 1:1)

अन्द्रियास – टर्की नरभक्षी इलाका

थोमा – भारत (52 ईसवी)

फिलिप्पुस – उत्तरी अफ्रीका

मत्ती – परसिया (फारस) इथोपिया

बरतिमाई – दक्षिणी अरेबिया

हल्फई का पुत्र याकूब – सीरिया

शमौन कनानी – फारस

मत्तियाह – सीरिया

युहन्ना – इफिसुस

प्रेरितों के समय में सुसमाचार इतना क्यों फैला

यीशु के शिष्यों में सुसमाचार सुनाने की तीव्र ईच्छा थी.

पवित्र आत्मा का सामर्थ

यूनानी संस्कृति और भाषा

मसीही प्रेम – यहूदी प्रेम.

यरूशलेम मंदिर का नाश

ए. डी. 70 में तीतुस नामक रोमी सेनानायक ने यरूशलेम पर आक्रमण किया और पूरा मंदिर नाश किया. इस घटना के द्वारा मत्ती 24:2 की भविष्यवाणी पूरी हुई थी.

ईस्वी 100 – 312 ईसवी तक क्रूस सताव का समय :- इस समय में मुख्य तौर से 10 सम्राट खड़े हुए जिन्होंने मसीह लोगों को बहुत क्रूर तरीके से सताया.

1. नीरो – इसके समय में पौलुस और पतरस मारे गए.

2. डोमिशियन – इसके समय में यहुन्ना को उबलते तेल में डाला गया.

3. मार्क्सओरिलियस सताव के समय कलीसिया को निम्नलिखित फायदे मिले. यीशु की कलीसिया और शुद्ध हो गई. कलीसिया और फ़ैल गई पूरा अर्मेनिया मसीही देश बन गया.

अफ्रीका के अन्दर कई देश यीशु में आ गए. स्पेन, फेंस और ब्रिटेन में सुसमाचार पहुँच गया. सेना के बड़े बड़े अधिकारियों ने यीशु को ग्रहण किया.

स्ताव के समय निम्नलिखित चर्च फादर्स का आगमन हुआ.

तरतुलियन – इनका जन्म नार्थ अफ्रीका में हुआ. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मसीहत को अपना अलगाव कायम रखना है. हर परिस्थिति में प्रभु में दृढ रहना है. तरतुलियन ने कहा कि “शहीदों का खून कलीसिया का बीज है.

xजस्टिन मार्टियर – इनका जन्म सामरिया में हुआ. इन्होने सबसे ज्यादा गलत शिक्षाओं का विरोध किया. अन्यजातियों के समान बलि न चढाने के कारण उनका सर काटा गया.

पोलीकार्प – स्मुरना कलीसिया के बिशप थे. युहन्ना के शिष्य थे. 86 वर्ष में शहीद हुए.

312 ईस्वी – 590 ईस्वी तक (मसीही साम्राज्य का समय)

रोमी सम्राज्य कोंस्टेंनटाइन का विश्वास करना – 306 ईस्वी में कोंस्टेंनटाइन पश्चिमी रोमी साम्राज्य का राजा बना. उसी के साथ पश्चिमी रोमी साम्राज्य का एक और राजा था.

मैक्सेटीयास. 312 में कोंस्टेंनटाइन और मैक्सेटीयास के बीच युद्ध हुआ. जिसमें कोंस्टेंनटाइन की हार सुनिश्चित थी परन्तु युद्ध से पहली रात कोंस्टेंनटाइन ने एक स्वप्न देखा जिसमें उसने एक क्रूस को अपने सामने देखा और उसे एक आवाज आई कि तू इसके साथ आगे बढ़.

जब कोंस्टेंनटाइन ने ऐसा किया तो उस युद्ध में वह जीत गया और उस जीत ने पूरे मसिहत का भविष्य बदल दिया. इसके बाद 324 ईस्वी में कोंस्टेंनटाइन पूर्व के राजा लिसिनस को भी पराजित करके पूरे रोम का सम्राट बन गया.

इससे कोंस्टेंनटाइन का विश्वास मसीहत में हो गया और उसने अपने आपको एक मसीही घोषित किया. जब कोंस्टेंनटाइनसम्राट बने तो उन्होंने मसीही धर्म को अपने साम्राज्य में बढ़ावा दिया.

इसका मुख्य कारण था कि वह इस धर्म को द्वारा अपने स्र्माज्य को एक बनाकर रखना चाहते थे.

कोंस्टेंनटाइन ने रोमी शर्मात बन्ने के बाद निम्नलिखित परिवर्तन किए.

उन्होंने मसीही पादरियों को राजनैतिक उपदेशकों का स्थान दिया और उनका टैक्स माफ़ कर दिया. राज्य के खजाने में से आराधनालय बनाने केलिए पैसे दिए जाने लगे.

कोंस्टेंनटाइन ने सभी सैनिकों को आगया दी कि वह मसीही अराधना में भाग लें. राज्य के खजाने में से आराधनालय बनाने के लिए पैसे दी जाने लगे.

कोंस्टेंनटाइन ने सभी सैनिकों को आगया दी कि वह मसीही अराधना में भाग लगे. कोंस्टेंनटाइन ने सभी सैनिकों को आज्ञा दी कि वह मसीही आराधना में भाग लें.

अन्यजातियों के त्यौहार एवं परम्पराओं ने कलीसिया में प्रवेश किया. जैसे सूर्य के जन्म को यीशु के जन्म के रूप में परिवर्तित करके 25 दिसंबर को मनाना. ईस्तरोत देवी के त्यौहार को ईस्टर में परिवर्तित करना.

कलीसिया में धन सम्पत्ति का प्रवेश हुआ. इस धन सम्पत्ति के आने के कारण लोगों का प्यार प्रभु के प्रति पहले जैसा नहीं रहा.

लोग अब परमेश्वर से ज्यादा धन सम्पत्ति और पद को ज्यादा महत्त्व देने लगे. गलत शिक्षाएं उठने लगी. जैसे.

ऐरियनिजम – एरियस एक पादरी था. जिसने इस तरह से सिखाया कि यीशु मसीह मात्र एक सृष्टि है. और वह परमेश्वर का स्थान नहीं रखता. एरियस ने यह भी सिखाया कि यीशु मसीह सृती होने कारण पाप में गिर सकते थे.

इस तरह एरियस को एक गलत शिक्षक के रूप में घोषित किया एवं कलीसिया ने त्रिएकता का अंगीकार किया. इस सम्मेलन में 200-300 विशप थे.

380 AD में रोमन कैथलिक चर्च रोमी साम्राज्य को मुख्य धर्म घोषित किया गया.

आराधना शैली में बदलाव

संतो की आराधना शुरू हो गई. मरियम को माता ईश्वर के रूप में लोग पूजने लगे.

वस्तुओं को श्रद्धा देने लगे. मृतक लोगों के नाम पर प्रार्थनाएं होने लगी. पादरी वर्ग का स्थान विश्वासियों से ऊंचा कर दिया गया.

मोनास्टिसिजम – आश्रम जीवन की शुरुआत :- लोगों ने परमेश्वर के साथ एक ऊंचे और पवित्र जीवन में जुड़ने की कोशिश शुरू की.

उनके अनुसार अगर शारीर के द्वारा पाप हो रहा है तो बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि शरीर को कोई आनन्द का मौका मत दो.

रोम के बिशप ने पोप होने का दावा किया

पोप का अर्थ है “पवित्र पिता”

रोम के विशप ने ऐसा दावा किया कि वह – परमेश्वर और मनुष्य के बीच में मध्यस्थ है.

उसका अधिकार वचन से भी ऊपर है.

उसका स्थान परमेश्वर के तुल्य है. मतलब वह कभी पाप नहीं कर सकता.

वह वचन को अपनी मर्जी से बदल सकता है.

यह भाग एक है इसका अगला भाग पढने और जानने के लिए बने रहिये बाइबिल वाणी में आशा करते हैं यह मसीही कलीसिया का इतिहास | Christian Church History लेख आपको पसंद आया होगा. आप हमारे चेनल को भी सबस्क्राइब कर सकते हैं नीचे लिंक है.

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पास्टर राजेश बावरिया (एक प्रेरक मसीही प्रचारक और बाइबल शिक्षक हैं)

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