दोस्तों आज हम जानेंगे मूसा की कहानी | Moosa ki kahani मूसा के जीवन की एक बेहतरीन घटना तो आइये शुरू करते हैं.
मूसा की कहानी बाइबल से | bible mein Musa ki kahani

जैसा कि हम सभी जानते हैं बाइबिल के पुराने नियम के हीरो में एक महान नाम मूसा का भी है जिसे इस्लाम में हजरत मूसा अली सलाम की कहानी भी कहते हैं.
परमेश्वर ने मूसा को पृथ्वी के सभी लोगों में सबसे नम्र व्यक्ति कहा है. यह एक बहुत बड़ा खिताब है.
मूसा के नाम का अर्थ है – पानी से निकाला गया. क्योंकि उन दिनों जब इस्राएली लोग मिस्र में लगभग 400 वर्षों तक फिरौंन के गुलाम थे.
उन दिनों फिरौन ने आदेश दिया था कि सभी इस्राएलियों के लड़के जो पैदा होंगे उन्हें मार दिया जाए. और लड़कियों को छोड़ दिया जाए.
ऐसे कठिन दौर में मूसा के माता पिता ने मूसा को कुछ दिन तक तो छिपा कर रखा.
मूसा की माता का नाम – योकेबेद था
लेकिन जब वे ज्यादा दिन न छिपा पाए तो उसकी माता ने उस शिशु को एक टोकरी में रखकर नील नदी में बहा दिया इस विश्वास में कि परमेश्वर उसकी सहायता करेगा.
और ऐसा हुआ उसी समय वहां फिरौन की बेटी (राजकुमारी) नदी के तट पर नहाने को आई और उसने इस बालक को देखा जो बहुत सुन्दर था उसका उसी समय नाम रखा मूसा…
और उसे अपने बेटे के समान राजमहल में पाला पोसा. मूसा को राजमहल में सारी विद्या सिखाई गई थी वह सारी विद्या में और बोलने में निपुण था.
मूसा फिरौन की कहानी
मूसा जब जवान हो गया तो उसे पता था कि उसके लोग अर्थात इस्राएली लोग गुलामी में जी रहे हैं. ऐसे समय उसने देखा फिरौन के सैनिक फिरौन के आदेश से इस्राएली लोगों पर बहुत ही सताव और जुल्म करते हैं.
तब एक दिन मूसा ने एक सैनिक को जो उसके इस्राएली को सता रहा था. उसे अकेला पाकर मूसा ने मार डाला.
और जब उसे पता चला की यह बात सभी को पता चल गई है तो मूसा मिस्र छोड़कर मिद्यान देश की ओर भाग गया.
और वहीँ रहने लगा. वहीँ वह एक स्त्री से मिला जिसके साथ उसका विवाह हुआ.
मूसा की पत्नी का नाम सिप्पोरा था.
मूसा के ससुर का नाम यित्रो था. मूसा अपने ससुर यित्रों की भेड़ बकरियां चराने का काम करता था.
लगभग चालीस वर्ष तक भेड़ बकरियां चराने के पश्चात एक दिन परमेश्वर ने उसे एक जलती हुई झाड़ी से बातें किया.
वह अद्भुत झाड़ी जल तो रही थी लेकिन भस्म नहीं हो रही थी. और वहीँ परमेश्वर ने मूसा को मिस्र में वापस जाकर उसके लोग अर्थात इस्राएलियों को आजाद कराने की बुलाहट दी.
मूसा वापस मिस्र में जाता है और फिरौन से अपने लोगों को आजाद कराने की मांग करता है. वह वहीँ जाता है जहाँ से जवानी में भागा था.
लेकिन आज वह डरा हुआ नहीं है क्योंकि परमेश्वर की बुलाहट और उसकी सामर्थ उसके साथ है.
मूसा की लाठी – आप इस लेख को भी अवश्य पढ़ें
मूसा परमेश्वर की लाठी की सामर्थ से बड़े बड़े चमत्कार करता है और आखिरकार इस्राएलियों को आजाद करवा लेता है.
लेकिन अब इस्राएलियों को 40 वर्षों तक जंगल में मूसा के साथ साथ चलना होता है जहाँ परमेश्वर उन सभी लगभग 30 लाख लोगों की सहायता करता है
उन्हें भोजन खिलाता है और सम्हालता है. अब इतने बड़े जन सैलाब को सम्हालना और उनकी समस्या का समाधान करना हर किसी की बस की बात नहीं थी.
ये लोग बहुत ज्यादा हठीले लोग थे. वे बात बात में मूसा पर कूड़कूड़ाते थे. लेकिन मूसा हर बात के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करता था.
और इस रीती से मूसा परमेश्वर से आमने सामने बात करने वाला जैसा हो गया.
मूसा की प्रार्थना | मूसा की कथा
निर्गमन की पुस्तक 33 अध्याय में हम पाते हैं कि एक बार मूसा ने परमेश्वर से प्रार्थना की, कि वह परमेश्वर को प्रत्यक्ष रूप से देखना चाहता है.
परमेश्वर ने उसे बताया कि कोई भी मनुष्य परमेश्वर को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकता लेकिन मूसा की प्रार्थना को परमेश्वर नजरअंदाज नहीं करना चाहते थे
अत; परमेश्वर ने एक उपाय निकाला और उसे पत्थर को ओट में रखकर स्वयं परमेश्वर साक्षात उसके वहां से निकला लेकिन
परमेश्वर ने मूसा को बचाने के लिए उस के ऊपर अपना तेजोमय हाथ रख लिया ताकि उसके तेज से मूसा की मृत्यु न हो जाए. मूसा परमेश्वर के पीछे का तेज को देख पाया लेकिन साक्षात प्रत्यक्ष में नहीं.
मूसा की मृत्यु कैसे हुई
एक दिन लोगों को प्यास लगी थी पानी का स्रोत कही भी नजर नहीं आ रहा था.
उस समय परमेश्वर ने मूसा से कहा, जाकर एक चट्टान से कहना और उस चट्टान से पानी निकल आएगा.
लेकिन लोगों का कूड़कूड़ाना इतना ज्यादा था की मूसा ने लोगों के दबाव में आकर उस चट्टान से बाते करने के बजाय उसे दो बार लाठी से मारा और यह बात परमेश्वर को अच्छी नहीं लगी.
और इस अनाज्ञाकारिता के कारण परमेश्वर ने मूसा को उस प्रतिज्ञा किये हुए देश में प्रवेश करने नहीं दिया.
परमेश्वर ने कहा वह उस देश को दूर से देख तो सकता है लेकिन प्रवेश नहीं कर सकता.
यह मूसा के लिए बहुत दुःख की बात थी. और किसी के लिए भी दुःख की बात होती.
जिसके लिए उसने पूरी जिन्दगी लगा दी अंत में उसे वही चीज न मिले तो दुःख तो होगा.
मूसा की मृत्यु कहाँ हुई
जब मूसा 120 वर्ष का हुआ उस समय भी वह पूरी रीती से स्वस्थ था उसकी आँखें धुंधली नहीं पड़ी थीं.
प्रतिज्ञा किए हुए देश कनान से पहले नेबो नामक पर्वत पर मूसा ने बिदाई ली और उसकी मृत्यु हो गई.
और परमेश्वर ने उसके पार्थिव शरीर को अपने हाथों से दफनाया. यह पहला केश था जब किसी को परमेश्वर ने अपने हाथों से दफनाया था.
अब सवाल उठता है कि इतने महान परमेश्वर के दास को इतना भी अधिकार नहीं मिला कि जिस देश में वह लाखो लोगों की अगुवाई कर रहा था उस देश में जाकर आनन्द मना सके.
नए नियम में मूसा | ईसा और मूसा कौन थे
तो इसका उत्तर है कि मूसा का आनन्द परमेश्वर के साथ था. उसने पहले ही कहा था प्रभु जहाँ आप नहीं जा रहे वहां मुझे भी नहीं जाना. मूसा की असली ख़ुशी परमेश्वर के साथ थी.
मैं विश्वास करता हूँ परमेश्वर भी उसे वह सब कुछ देना चाहता था जो सभी को मिलेगा. बल्कि उनसे ज्यादा लेकिन परमेश्वर अपने आज्ञा पालन को भी सर्वोपरि रखता है.
जब मैं यह लिख रहा हूँ मेरे दिल में भी डर है कि मैं किसी भी रीती से किसी व्यक्ति को गुमराह नहीं करना चाहता. और परमेश्वर का डर भी मेरे अन्दर है. यदि आपको कोई प्रकाशन मिलता है आप भी मुझे कमेन्ट में बताना.
हम लेख को आगे बढाते हैं. परमेश्वर को भी दुःख रहा होगा कि मेरा बेटा (मेरा दास) मूसा जो इतने वर्षो तक वफादार था उसे यह आशीष से वंचित होना पड़ेगा.
मूसा के दोनों प्रार्थनाओं और इच्छाओं का उत्तर प्राप्त होना.
इसलिए लिए जब हम नए नियम में आते हैं तो देखते हैं प्रभु यीशु जो स्वयं यहोवा है. मानव रूप लेकर इस धरती पर आये उस समय में (मत्ती 17:1-8 और लूका 9:31)
जिसे रूपान्तर का पर्वत भी कहा जाता है. प्रभु यीशु जब अपने पतरस युहन्ना और याकूब को लेकर प्रार्थना करने जाते हैं वहां प्रभु यीशु का रूप बदल जाता है
और पूरी रीती से उज्वल हो जाते हैं वहां पर मूसा और एलियाह भी प्रगट होते हैं. ये स्थान वही प्रतिज्ञा किया हुआ देश का स्थान है.
और मूसा जिसे देख रहा था ये वही यहोवा परमेश्वर हैं जिसे प्रत्यक्ष में देखने की मूसा ने प्रार्थना और चाह की थी. इस रीती से परमेश्वर ने मूसा की दोनों इच्छा पूर्ण की.
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