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क्रूस पर यीशु ने क्या कहा ? | Why Good Friday 2022 Hindi | Seven Sayings of Jesus in Hindi | गुड फ्राइडे विशेष

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यीशु मसीह की सात अमरवाणी | हिंदी सरमन नोट्स | गुड फ्राइडे क्यों मनाया जाता है

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गुड फ्राइडे क्यों मनाया जाता है, क्योंकि प्रभु यीशु ने हमारे पापों से उद्धार के लिए अपने प्राणों को दे दिया

क्रूस पर यीशु का पहला वचन | ईसा मसीह को सूली पर क्यों चढ़ाया गया

तब यीशु ने कहा, “हे पिता इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं.”

जय मसीह की, आज हम बात करेंगे उस प्रथम वाणी के विषय में, जो प्रभु यीशु मसीह ने क्रूस पर कहीं थी. सोच कर देखें उस मंजर को या उस घटनाओं के विषय में जो उस समय पर हुई.

उसके अपने चेले ने जिस पर उस ने इतना भरोषा किया था कि पैसों के हिसाब- किताब जैसा जरूरी काम उसको सौंपा था उसी ने उसको धोखा दिया और धोखे से यीशु को पकडवा दिया.

उसके अपने चेले ने जिससे उसने वादा किया कि तुझ पर अपनी कलीसिया को बनाऊंगा उसने उसका इंकार कर दिया कि मैं तो इसे जानता ही नहीं. जिस सैनिकों ने उसको पकड़ा उन्होंने ठठ्ठों में उड़ाकर उसको पीटा, उसकी आखें ढक कर पूछ कि बता तुझे किस ने मारा? उसके विषय में बहुत सी निंदा की और विरोध की बातें कहीं.

महासभा के सामने उसे लाया गया, पिलातुस के सामने उसे लाया गया, हेरोदेश के सामने उसे लाया गया, फिर दोबारा उसे पिलातुस के साम्हने लाया गया और हर जगह उस पर झूठे आरोप लगाए गए. यहाँ तक लिखा है कि वो टन मन से उस पर दोष लगाते रहे.

उस के मुंह पर लोगों के थूका और उसको कोड़ों से मारा, और उसको दो चोरो के साथ क्रूस पर चढ़ा दिया गया उसके हाथों और पैरों में कीले ठोक दी गईं और उसको काँटों का ताज पहनाया गया और तब सैनिक इंतजार कर रहे थें उसके मरने का और उसके कपड़ों को आपस में बांटने के लिए उनहोंने चिट्टियाँ डालीं.

जैसे भेंड वध होने के समय और भेंडी ऊन कतरने के समय चुपचाप और शांत रहती है, वैसे ही उस ने भी अपना मुंह न खोला,

और अब उस क्रूस पर पहली बात वो कहता है. कि हे पिता इन्हें क्षमा कर क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं.

जिस समय किसी को क्रूस पर चढ़ाया जाता है उस समय पर बोलना एक आम बात है लोग अक्सर उस समय पर कराहते हैं, अपने दर्द को बयान करते हैं, उन सैनिकों को कोसते हैं जो उस पर स्ताव करते हैं या क्रूस पर चढाते हैं, उस सरकार को उस राजा को कोसते हैं या कई बार अपने पापों का अंगीकार करते हैं.

परन्तु प्रभु यीशु मसीह जो कि निर्दोंष है और अपने शब्दों में इतनी सामर्थ को रखता है कि उसके कहने मात्र से सूर्य और चाँद बन जाते हैं. ये वही सृजन करने वाला वचन है. जो आदि में था और जिसके द्वारा समस्त संसार की सृष्टी (रचना) हुई

और जो देहधारी होकर हमारे बीच में आया और जो उस क्रूस पर चढ़े हुए भी इतनी सामर्थ को रखता है कि एक इशारा करे तो लाखो स्वर्गदूत आकर धरती को पल भर में नष्ट कर सकते हैं.

इतनी सामर्थ रखने के बावजूद भी देखो वो दयालु प्रभु यीशु क्या कहता है, “कि हे पिता इन्हें क्षमा कर” उसके इस एक कथन से हम उसके विषय में बहुत कुछ सीख सकते हैं.

उन सातों अमर वाणियों को यदि हम क्रम से देंखें तो उस ने शुरुआत की दूसरों के लिए कुछ मांग कर. | गुड फ्राइडे विशेष

अगर यीशु मसीह की जगह कोई और दूसरा व्यक्ति होता तो वो शुरुआत करता अपने लिए कुछ मांगकर या अपने से संबंधित कोई बात कहकर जैसे कि परमेश्वर तू मेरी सहायता कर. मुझे ये दुःख सहने की शक्ति दे, या मेरी आत्मा को स्वीकार कर और फिर वो दूसरों के लिए या अपने परिवार के लोगों के लिए कुछ कहता.

लेकिन यीशु मसीह ने अपनी वाणी में सबसे पहले दूसरों के लिए, फिर अपने परिवार के लिए कुछ कहा और अंत में अपने लिए कहा कि पिता मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ.

उसने निस्वार्थ भाव से अपने से पहले दूसरों के विषय में सोचने का एक गुण हम मसीह यीशु के जीवन में पाते हैं. अक्सर हम किसी भी चीज में पहले अपने आप को रखते हैं और बाद में लोगों को परन्तु ये मसीह की शिक्षा नहीं है. अपने जीवन के अंत तक वो अपने जीवन के मकसद पर या परमेश्वर की मर्जी जो उसके जीवन से है उस पर टिका रहा.

वो किसी भी असमंजस या Confusion में नहीं है पर उसे स्पष्ट पता है कि वो इस धरती पर क्यों आया. उसके कहा, था, ” मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उस की सेवा की जाए, पर इसलिए आया कि वह आप दूसरों की सेवा करे, और बहुतों की छुड़ोति के लिए अपने प्राण दे.

और अपने जीवन की अंतिम घड़ी में भी उसने अपने उस एकमात्र Purpose उद्देश्य को या दुसरे शब्दों में अपने पिता की इच्छा को नहीं त्यागा. और लोगों के उद्धार के लिए परमेश्वर से क्षमा की प्रार्थना की.

उसका यह कहना कि हे पिता इन्हें क्षमा कर इस बात का सबूत है कि उसने वो किया जो उसने प्रचार किया. यह कथन साबित करता है कि जो उसने कहा वो करके भी दिखाया.

उसने प्रचार किया था कि “मैं तुम से यह कहता हूँ कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करो. (मत्ती 5:44) और उसने कहा जो तुम्हें शाप दे उन को आशीष दो, जो तुम्हारा अपमान कर, उनके लिए प्रार्थना करो. (लूका 6:28)

देखो, कोई व्यक्ति जीवन भर ड्रामा कर सकता है और अच्छे होने का नाटक कर सकता है लेकिन जब उसका अंत आता है तो उस व्यक्ति की असलियत सामने आ ही जाती है है. लेकिन प्रभु यीशु ने पहले कर के दिखाया और फिर हम से अपेक्षा करता है कि हम भी ऐसा ही करें.

उसके शब्दों में ध्यान दें उसके पहले शब्द “हे पिता” उसके मुख से जो पहला शब्द निकला तो था हे पिता. और ये इस बात को साबित करता है कि बेशक समय कितना भी कठिन था, कितने भी दुखों को वो अपने शरीर में सह रहा था, पर इन सब के बीच में उसका पिता पर से विश्वास स्थिर था.

अगर कोई और ब्यक्ति उस परिस्थिति में होता और बेगुनाह होकर भी इतने कष्टों को सह रहा होता तो उसके मन में आ ही जाता कि कौन पिता कैसा पिता ऐसे हालातों में अक्सर हमारा विश्वास कमजोर हो जाता है. परन्तु यीशु मसीह उस समय क्रूस पर होने के बावजूद भी उसका विश्वास दृढ रहा.

और एक और बात हम इसमें देख सकते हैं कि ऐसे समय पर इंसान के मुंह से यू ही कुछ भी नहीं निकलता पर उसका जो असली चरित्र है वो निकल कर आता है. यीशु मसीह ने अपने जीवन में इतना समय प्रार्थना में बिताया था की वो अब उसके स्वभाव का एक हिस्सा बन गया है ये उसका nature बन गया था. और यही स्वभाव हम उस क्रूस पर प्रार्थना के रूप में देखते हैं.

इस पहली वाणी से हम क्या सीख सकते हैं. :- जो प्रार्थना उसने उस मस्य की हमारे और परमेश्वर के बीच में मध्यस्थता की प्रार्थना उसके कारण आज हमारे जीवन में एक आशा है कि हम आने पापों की क्षमा को पा सकते हैं. और ये वाणी हमें इस बात का आश्वासन देती है कि आज भी मेरे और आप के पापों के लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करता है.

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