यीशु-की-प्रार्थना

यीशु मसीह का प्रार्थना का जीवन | यीशु की प्रार्थना | ईसाई धर्म के संस्थापक कौन हैं ?

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प्रार्थना करना मसीही जीवन की स्वास है.. बाइबल में ऐसे अनेक महान लोग हुए हैं जिन्हें प्रार्थना योद्धा कहा जा सकता है लेकिन उन सभी में प्रभु यीशु की प्रार्थना का जीवन हम सभी के लिए एक आदर्श है.

संत पौलुस रोमियो की कलीसिया को पत्र लिखते समय कहते हैं रोमियो 12:12 आशा में आनन्दित रहो, क्लेशों में स्थिर रहो और प्रार्थना में में नित्य लगे रहो....Be faithful in prayer..devoted…be constent or be continue in prayer.

यीशु-की-प्रार्थना
Image by Pete Linforth from Pixabay यीशु-की-प्रार्थना

यदि हमारे जीवन से हमारी आशा ले ली जाए तो हमारा जीवन समाप्त समझो. आशा के कारण ही हम जीवित हैं. हम मसीह लोगों के पास जीवित आशा है कि हमारा जीवित प्रभु यीशु पुन: आएगें और हमको अनंतजीवन प्रदान करेगे. उसके लिए इस दुनिया के क्लेशों में स्थिर रहना होगा …

.क्लेश अंदरूनी और बाहरी दोंनो प्रकार के होते हैं….लेकिन यदि हमें आशा में आनन्दित रहना है और क्लेशों में स्थिर रहना है तो एक रहस्य है जय पाने के लिए वो है प्रार्थना लगातार करते रहना.

Devoted word का मूल भाषा में अनुवाद होता है लगातार करते रहना…और यह बाइबल में अनेको स्थान में प्रार्थना के लिए इस्तेमाल किया गया है.

कुलु 4:2 प्रार्थना में लगे रहो. लूका ने 9 बार यीशु मसीह की प्रार्थना का जिक्र किया है.

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यीशु मसीह के जीवन से सीखेंगे प्रार्थना का रहस्य

प्रभु यीशु मसीह के जीवन में सेवा के प्रारंभ से क्रूस की म्रत्यु तक हम लगातार प्रार्थना को देखते हैं. आज हम लूका रचित सुसमाचार में यीशु के जीवन की प्रार्थना के विषय में सीख को देखेंगे. प्रभु यीशु मानव रूप में स्वयं परमेश्वर थे उन्होंने हम मानव जाति को प्रार्थना का एक आदर्श प्रदान किया है.

यीशु मसीह के पास प्रार्थना का अनुशासन था ( Habbit  of Prayer)

लूका 22:29 उनकी रीति थी प्रार्थना करना प्रभु की रीति थी….एक नियम था…हम केवल विपत्ति में प्रार्थना करते हैं…जब समस्या या विपत्ति सामने है….क्या हमारे अंदर उसके साथ समय बिताने की भूख है?

यदि हम प्रार्थना के प्रति प्रेम है, जिज्ञासा है भूख और प्यास है तो हम एक प्रार्थना का अनुशासन अवश्य बनाएंगे. और एक रीती बनाएंगे जैसे बाकि अन्य अति आवश्यक कार्यों को करने के लिए हम एक निश्चित समय निकालते हैं.

यीशु मसीह के पास प्रार्थना करने का एक निश्चित स्थान था. (लूका 5:11 , 6:12, 9:28, 11:1)

यीशु भीड़ से दूर जाकर प्रार्थना करते थे ….हम सभी भीड़ में रहना चाहते हैं. भीड़ की ओर आना चाहते हैं लेकिन प्रभु भीड़ से दूर जाकर. अपने चेलों से भी थोड़ा दूर जाकर प्रार्थना करते थे.

अपनी बढती हुई प्रसिद्धि और व्यस्तता के बीच में यीशु प्रार्थना के लिए अलग जाते थे. (लूका 5:16) यीशु जंगल में अलग जाकर प्रार्थना करते थे. …

यीशु मसीह महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले लम्बी प्रार्थनाएं किये थे.

सेवा करने से पहले 40 दिन की प्रार्थना

चेलों को चुनने से पहले पूरी रात प्रार्थना

क्रूस पर जाने साइ पहले गतसमने में लम्बी प्रार्थना

क्या जिन्दगी के बड़े कठिन निर्णय को लेने से पहले क्या हम यीशु के ईस नमूने को इस्तेमाल करते हैं. …

यीशु मसीह ने सार्वभौमिकऔर व्यक्तिगत जीवन में प्रार्थना किया ….

चेलों के साथ भी और अकेले भी

चेलों के साथ छोटी प्रार्थना

अकेले में लंबी प्रार्थना

अकेले की प्रार्थना ही जीवन की वास्तविक प्रार्थना है.9:18, 28, 22:39

यीशु मसीह ने जब प्रार्थना की तो क्या हुआ?

और जब आप और हम प्रार्थना करते हैं तो क्या हो सकता है?

आकाश खुल गया

पवित्रात्मा उतरा

आकाशवाणी हुई कि मैं इससे प्रसन्न हूँ

क्या आपको लगता है इन तीन बातों की आपको भी आवश्यकता हैआपको लगता है आपके जीवन के इस दौर में आसमान की आशीषों को खुलना है….क्या आप को पवित्रात्मा की भरपूरी चाहिए….क्या आप चाहते हैं परमेश्वर की स्पष्ट वाणी उसका वचन आपके लिए उतर आये ….तो आपको प्रार्थना की आवश्यकता है….

यीशु मसीह ने जब प्रार्थना की तो शैतान की युक्तियों को परास्त कर दिया (लूका 1:1-13)

यीशु मसीह ने प्रार्थना में मार्गदर्शन को प्राप्त किया

यीशु मसीह की निर्भरता प्रार्थना पर थी…..

 प्रार्थना में यीशु का रूप बदल गया (लूका 9:29)

प्रार्थना के स्थान में ही आपका रूप बदलता है,….मूसा का रूप बदल गया थाउसके चेहरे से रौशनी निकल रही थी. …चमकने लगाहन्ना ने प्रार्थना कर चुकी तो निराशा दूर हो गई….एलिया जब प्रार्थना के स्थान से आया तो उसका रूप और उसकी वाणी बदल गई थी राजा के सामने हियाव से बोलने लगा…..

जब यीशु ने प्रार्थना की तो उसके चेलों ने प्रार्थना करना सीखने की इच्छा जताई…. | प्रार्थना कैसे करना है?

जब हम प्रार्थना करते हैं तो हमारे इर्द गिर्द के लोग हमारे बच्चे पति पत्नी प्राथना करना सीखते हैं ….

जब यीशु ने प्रार्थना की तो उसका चेला पतरस अपने विश्वास से गिरने से बच गया…(22:31)

कुलु में संत पौलुस कहते हैं इपफ्रास प्रार्थना का योद्धा है ताकि तुम पाप में गिरने से बच जाओ

आपकी और मेरी प्रार्थना लोगों को विश्वास से भटकने से बचा सकती है.

यीशु ने प्रार्थना की तो क्रूस की पीड़ा उठाने की सामर्थ प्राप्त की….(22:39-46)

परीक्षा की घड़ी में सोने वाले चेले तो भाग खड़े हुए लेकिन प्रार्थना करने वाला यीशु परीक्षा में भी खड़ा रहा….

किसको प्रार्थना करना चाहिए

जो अपने प्रभु के साथ रिश्ते को लेकर गम्भीर है….

जो प्रभु की आज्ञा को पूरा करने के प्रति गंभीर है….

– जो अपनी दौड़ को ठीक रीति से पूरा करना चाहते हैं….

FAQ

Q. परमेश्वर का असली नाम क्या है ?

Ans. परमेश्वर के दास मूसा ने एक बार परमेश्वर से उसका नाम पूछा था और कहा मैं उन्हें क्या कहूँगा कि आप कौन हैं तब परमेश्वर ने कहा था “मैं जो हूँ सो हूँ” जिसका मूल भाषा इब्रानियों में अर्थ है यहोवा अर्थात छुडाने वाले इसी कारण बाइबल में परमेश्वर का नाम यहोवा पुकारा गया है.

Q. इसाई धर्म में अंतिम संस्कार कैसे होता है ?

Ans. इसाई धर्म में लोग विश्वास करते हैं प्रभु यीशु के द्वतीय आगमन में अपने स्वर्गदूतों के साथ जब आयेंगे तो वे उन सभी लोगों को जो विश्वास करते थे और सो गए हैं अर्थात मर गए हैं वे जीवित होकर प्रभु के साथ स्वर्ग जाएंगे. इसलिए इसाई धर्म के लोग, अंतिम संस्कार में मरे हुए लोगों को ताबूत में रखकर उन्हें जमीन में दफनाते हैं जिसे दफनाई संस्कार भी कहा जाता है.

Q. ईसा मसीह किसका अवतार हैं ?

Ans. बाइबल कहती है, यूहन्ना रचित सुसमाचार में आदि में वचन था वचन परमेश्वर के साथ था और वचन ही परमेश्वर था और वही वचन देहधारी हुआ अर्थात परमेश्वर स्वयं देहधारी हुए. यूहन्ना 1:1-3 इस वचन के अनुसार यीशु स्वयं परमेश्वर के अवतार थे वे स्वयं परमेश्वर हैं.

Q. यीशु मसीह के कितने चेले थे ?

Ans. यीशु मसीह के मुख्य चेले 12 ही थे जिन्हें प्रेरित कहा गया था जिनके नाम ये हैं पतरस, यूहन्ना, अन्द्रियास याकूब फिलिप्पुस, बर्तिलमय, थोमा, मत्ती, याकूब, यहूदा, यहूदा इस्क्रियोती, शमौन जिलोतेस. लेकिन लूका रचित सुसमाचार अध्याय 10 के अनुसार यीशु मसीह ने 70 और चेले नियुक्त किये थे जो शायद बाद में यीशु के साथ न चल सके.

Q. ईसा मसीह के माता-पिता का नाम क्या था ?

Ans. ईसा मसीह के सांसारिक पिता का नाम युसुफ था और माता का नाम मरियम था.

Q. ईसा मसीह के पत्नी का क्या नाम था ?

Ans. ईसा मसीह ने विवाह नहीं किया वे इस दुनिया में सभी मानव जाति का उद्धार करने आये हुए परमेश्वर के रूप थे उन्होंने सारे मानव जाति के समस्त पापों को अपने ऊपर उठाकर क्रूस पर प्राण त्याग दिए और तीसरे दिन मृतकों में से जी उठे. उनके विश्वास करने वाले जहाँ एकत्र होते हैं उन समूह को कलीसिया कहते हैं और संत पौलुस उस कलीसिया को मसीह की दुल्हन भी कहते हैं.

Q. इसाई धर्म का संस्थापक कौन हैं ?

Ans. बाइबल के अनुसार इसाई कोई धर्म नहीं हैं क्योंकि यीशु मसीह ने कोई धर्म को बढ़ावा नहीं दिया न ही कोई धर्म की स्थापना की उन्होंने सारे मानव जाति को सत्य मार्ग का रास्ता दिखाया लेकिन उनके अनुयायी लोगों को अर्थात उनके चेलों को क्रिस्चियन या मसीही कहकर पुकारा गया. इस प्रकार यदि कोई इसाई को एक धर्म मानता है उसके अनुसार इसाई धर्म का संस्थापक यीशु मसीह हैं.

Q. परमेश्वर का ज्ञान क्या है ?

Ans. परमेश्वर का ज्ञान प्रभु यीशु है, बाइबल के अनुसार यीशु मसीह में ही चाहे देखी हो या अनदेखी सभी चीजों का सृजन यीशु मसीह में हुआ है वही परमेश्वर का ज्ञान है.

Q. हम परमेश्वर को क्या दे सकते हैं बाइबल से ?

Ans. हम परमेश्वर को धन्यवाद दे सकते हैं. जहाँ तक बात वस्तुओं की है तो सभी वस्तुएं परमेश्वर ने स्वयं ही रची हैं और ये पृथ्वी और जो कुछ इसमें है वो परमेश्वर ने ही बनाया है, इसलिए कोई भी प्राणी परमेश्वर को कुछ भी नहीं दे सकता. हम उसे केवल धन्यवाद का बलिदान दे सकते हैं.

Q. परमेश्वर का प्रेम क्या है ?

Ans. परमेश्वर का प्रेम प्रभु यीशु मसीह है, यूहन्ना रचित सुसमाचार के 3:16 में लिखा है क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र अर्थात यीशु मसीह को इस दे दिया ताकि जो कोई उस पर अर्थात यीशु मसीह पर विश्वास करेगा वो नाश न होगा मतलब अनंत काल की उस आग में नर्क में नहीं जाएगा बल्कि स्वर्ग में अनंत जीवन पाएगा.

Q. परमेश्वर की आराधना कैसे करें ?

Ans. परमेश्वर की अराधना हमें आत्मा और सच्चाई से करना चाहिए. प्रभु यीशु ने एक सामरी स्त्री को इस प्रकार कहा था परमेश्वर ऐसे आराधकों को ढूढ़ता है जो परमेश्वर की आराधना आत्मा और सच्चाई से करते हैं. यूहन्ना 4

Q. यहोवा नाम का मतलब क्या है ?

Ans. यहोवा नाम का मतलब छुड़ाने वाला है, अर्थात परमेश्वर ने अपने लोगों को हर एक संकट में संग रहकर उन्हें छुड़ाया था सबसे पहले यह नाम परमेश्वर के दास मूसा पर प्रगट हुआ जब परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिश्र देश से बंधुआई से छुटकारा दिलाने के लिए मूसा को उस देश में भेजा था.

Q. धर्म कैसे बदलें ?

Ans. यह सवाल ही गलत है, अक्सर पूछा जाता है धर्म बदलने के विषय में. लेकिन धर्म तो मनुष्य ने ही बनाया है, मनुष्य को धर्म नहीं अपना मन बदलना चाहिए. क्योंकि मन ही है जो सारी बुराई की जड़ है. जिसमें असाध्य रोग लगा हुआ है. मनुष्य अपना मन बदल ले तो सभी प्राणियों से प्रेम और सदभाव के साथ रहना प्रारंभ कर देगा. धर्म के नाम से दंगे होते हैं लेकिन प्रेम सब बातों को सह लेता है.

Q. सुसमाचार प्रचार क्या है ?

Ans. 1 कुरुन्थियों अध्याय 15 सुसमाचार प्रचार का अर्थ है सभी मानव जाति को यह बताना कि प्रभु यीशु उसके पापों के लिए मारे गए और गाड़े गए और तीसरे दिन मुर्दों में से जीवित हो गए. अब जो यह विश्वास करता है उन पर दंड की आज्ञा नहीं . अर्थात चाहे किसी के पाप कितने ही घिनौने क्यों न हो यीशु मसीह पर विश्वास करने के कारण वह समस्त पापों से छुटकारा पा लेता है फिर उसे किसी भी बलिदान की या बली की जरूरत नहीं यही सुसमाचार प्रचार है.

Q. मसीह जीवन कैसे जीना चाहिए ?

Ans. मसीह जीवन जीने के लिए एक व्यक्ति को तीन बातें करना अति महत्वपूर्ण हैं पहला उसका सम्बन्ध परमेश्वर के साथ अच्छा होना चाहिए मतलब वह प्रार्थना करने वाला होना चाहिए . दूसरा उसका सम्बन्ध अपने विश्वासी भाई बहनों के साथ अर्थात कलीसिया के अंदर के लोगों के साथ प्रेम के साथ होना चाहिए तीसरा उसका संबंध बाहर के लोगों के साथ भी अर्थात जो विश्वास में नहीं हैं या जो अपने आप को दूसरे धर्म का कहते हैं उनके साथ भी अच्छा होना चाहिए वही व्यक्ति एक सच्चा मसीह व्यक्ति होता है.

Q. मनुष्य का उद्धार कैसे होता है ?

Ans. मनुष्य का उद्धार प्रभु यीशु पर विश्वास करने से होता है. बाइबल कहती है मनुष्य यदि अपने मन से विश्वास करे और मुंह से अंगीकार करे की यीशु ही प्रभु है और उसके सारे पापों से छुटकारा दे सकता है तो प्रभु यीशु को अपना मुक्तिदाता मानकर ग्रहण करने से उसका उद्धार होता है.

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पास्टर राजेश बावरिया (एक प्रेरक मसीही प्रचारक और बाइबल शिक्षक हैं)

[email protected]


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