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Bible Sunday sermon in Hindi | रविवार बाइबल संदेश इन हिंदी

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दोस्तों आज हम परमेश्वर के वचन की महत्ता को समझने हेतु चर्चा करेंगे जिसे मैंने Bible Sunday sermon in Hindi | रविवार बाइबल संदेश इन हिंदी के लिए लिखा है तो आइये शुरू करते हैं.

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आज का वचन हमने लिया है 2 राजा 22:1-20 से

घटना ऐसी है कि जब योशिय्याह यरूशलेम का राजा बना तब वह आठ वर्ष का था और उसने 31 वर्षों तक उस देश में राज्य किया,

लेकिन जब वह 18 वर्षों तक राज्य कर चुका तब अपने मंत्री शापान को परमेश्वर यहोवा के भवन में भेजा ताकि उस भवन की मरम्मत की जा सके

(उसे ठीक किया जा सके) क्योंकि एक लम्बे समय से उस भवन में आराधना नहीं की गई थी. जब परमेश्वर यहोवा के भवन की मरम्मत की जा रही थी तब वहां से एक पुस्तक प्राप्त हुई

(जो यहोवा की व्यवस्था की पुस्तक थी) यह यहोवा की व्यवस्था की यह पुस्तक लगभग 75 वर्षों से वहीँ दबी हुई रखी थी जिसे किसी ने भी निकालकर नहीं पढ़ा था.

लेकिन जब राजा का मंत्री शापान उसे लेकर पढ़ा और जाकर राजा को पढ़ के सुनाने लगा तब राजा यह पुस्तक को सुनकर पूरी रीती से फूट फूटकर रोने लगा और दुःख के मारे अपने कपड़े (वस्त्र) फाड़ लिए.

और वचन 13 में लिखा है उसने मंत्री शापान और एक अन्य कर्मचारी को यह आज्ञा दी की “यह पुस्तक जो मिली है उसकी बातों के विषय में तुम जाकर मेरी और प्रजा की और सब यहूदियों की ओर से यहोवा परमेश्वर से पूछो,

क्योंकि यहोवा की बड़ी ही जलजलाहट हम पर इस कारण भड़की है, कि हमारे पुरखाओं ने इस पुस्तक की बातें न मानी कि जो कुछ हमारे लिए लिखा है उसके अनुसार करते.

तब वहां के एक नबी (भविष्यवक्ता) के द्वारा परमेश्वर ने बातें की और कहा, वचन 17- यहोवा यों कहता है, कि सुन, जिस पुस्तक को योडा के राजा ने पढ़ा है, उसकी सब बातों के अनुसार में इस स्थान और इसके निवासियों पर विपत्ति डालने पर हूँ.

उन लोगों ने मुझे त्याग कर पराये देवताओं के लिए धूप जलाया और अपनी बनाई हुई सब वस्तुओं के द्वारा मुझे क्रोध दिलाया है, इस कारण मेरी जलजलाहट इस स्थान पर भड़केगी और फिर शांत न होगी.

इस घटना को पढ़ कर समझ में आता है यदि वे लोग पहले इस पुस्तक को पढ़ते और परमेश्वर के वचन के अनुसार अपना जीवन यापन करते तो शायद वे मूर्ति पूजा नहीं करते और परमेश्वर को क्रोध को अपने ऊपर नहीं लाते और इस विपत्ति से बच जाते.

आज परमेश्वर का वचन हम सभी के पास है और नहीं तो बहुत ही सरलता से उपलब्ध है. लेकिन यदि हम इसे ध्यान से नहीं पढ़ते और इसके अनुसार नहीं चलते तो अपने ऊपर विपत्ति ला रहे हैं.

परमेश्वर के वचन की महत्ता

परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग करके, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है. (इब्रानियों 4:12)

उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैं ने उसको भेजा है उसे वह सफल करेगा. (यशायाह 55:11)

हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है.  ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए. (2 तिमु. 3:16-17)

प्रभु का वचन कहता है मेरे ज्ञान के न होने से मेरी प्रजा नाश हो रही है (होशे 4:6) परमेश्वर का वचन हमारे पाँव के लिए दीपक और मार्ग के लिए उजियाला है. (भजन 119:105) अर्थात वही हमारी सत्य-पथ पर अगुवाई करता है.

प्रभु यीशु मसीह ने कहा मनुष्य केवल रोटी से नहीं बल्कि हरेक वचन जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा. (मत्ती 4:4) अर्थात परमेश्वर का वचन ही हमारी आत्मा को पोषण देने वाली रोटी है.

परमेश्वर के वचन के लिए भूख जगाएं

इस संसार के अज्ञानता और पाप रूपी अन्धकार को यदि कोई दूर कर सकता है तो वह केवल और केवल परमेश्वर के वचन की सामर्थ्य के द्वारा ही सम्भव है, तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश से ही ये दुनिया रौशन हो सकती है.

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जिस प्रकार यिर्मयाह ने कहा, जब तेरे वचन मेरे पास पहुंचे, तब मैं ने उन्हें मानो खा लिया, और तेरे वचन मेरे मन के हर्ष और आनन्द का कारण हुए; क्योंकि, हे सेनाओं के परमेश्वर यहोवा, मैं तेरा कहलाता हूँ. (यिर्मयाह 15:16)

परमेश्वर के वचन का अति लघु इतिहास

प्रभु यीशु मसीह के स्वर्गारोहण के पश्चात प्रभु के चेलों ने सुसमाचार का प्रचार किया और संत पौलुस के द्वारा एशिया माइनर में कलीसिया का रोपण किया गया

और परमेश्वर का वचन फैलने लगा लेकिन बाद में यह रोमन सम्राज्य तक सिमित होकर रह गया और जब रोमन कलीसिया बढ़ने लगी तब उसमें एक गलत बात यह हुई

कि अन्य जातियों की रीती रिवाज भी इसमें प्रवेश कर गई और फिर परमेश्वर का वचन तो जैसे गायब ही हो गया. क्योंकि रोमन कलीसिया में पोप का ही अधिपत्य हो गया था

और परमेश्वर के वचन को पढने और अनुवाद करने का अधिकार किसी के पास भी नहीं था जो कुछ कलीसिया के फादर या प्रीस्ट लोग कहते थे लोगों को मानना पड़ता था.

इस प्रकार मूर्ति पूजा और बहुत सी गलत शिक्षा जैसे पैसे देने के द्वारा मरे हुए लोगों की आत्मा स्वर्ग में जाएगी आदि शिक्षा कलीसिया में प्रवेश कर गई. जो की अन्य जातियों की शिक्षा थीं.

यही कारण है एक हजार वर्ष तक पूरी दुनिया में वचन का अकाल जैसा था वचन था लेकिन उसका सही अनुवाद करने वाले कोई नहीं थे.

फिर जॉन हस और विलियम टिंडेल जैसे लोग उठे और न जाने कितने लोगों ने बाइबिल को लोगों तक पहुचाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी.

और फिर सन 1517 में एक महान व्यक्ति उठ खड़ा हुआ जिसका नाम मार्टिन लूथर था और उसने एक ऐसा आन्दोलन किया जिसे रिफोर्मेशन कहा जाता है.

वह एक बहुत पढ़ा लिखा व्यक्ति था जिसने रोमन कैथलिक कलीसिया की गलत शिक्षा का पुरजोर विरोध किया और वहां से शुरू हुआ प्रोटेस्टेंट समूह जो मानता है हर व्यक्ति के पास परमेश्वर का वचन होना चाहिए और हर व्यक्ति को उसे पढने और व्याख्या करने का अधिकार है.

Conclusion | निष्कर्ष

जिस प्रकार राजा दाउद कहने लगा, मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं. (भजन 119:18) उसी प्रकार हमे भी परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय प्रार्थना करना चाहिए.

आज यदि हम भी परमेश्वर के वचनों पर ध्यान नहीं देंगे तो एक बहुत बड़े नुक्सान को झेलना पड़ सकता है. यह वचन आज जो हमारे हाथों में है इसके लिए बहुत से लोगों ने बहुत बड़ी बड़ी कीमत चुकाई है. हमें उन सभी का शुक्रगुजार होना चाहिए.

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पास्टर राजेश बावरिया (एक प्रेरक मसीही प्रचारक और बाइबल शिक्षक हैं)
rajeshkumarbavaria@gmail.com


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