बाइबल-प्रचार

हिंदी बाइबल प्रचार कैसे बनाएं | प्रचारशास्त्र | How to write a sermon in hindi ?

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प्रचार | How to write sermon notes

बाइबल प्रचार या संदेश तैयार करने के अध्ययन को “उपदेश कला” (Homilitics) कहते हैं, यह शब्द (होमिलेटीक्स) (होमिली) HOMILY शब्द से निकला है जिसका अर्थ है शिक्षा की बातचीत करना या प्रवचन.

प्रचार की एक सरल परिभाषा इस प्रकार है :- एक व्यक्ति परमेश्वर के संदेश की घोषणा करता है, प्रचार वह तरीका है जिसके द्वारा परमेश्वर अपने संदेश मनुष्यों पर पहुंचाता है.

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Photo by Nils Stahl on Unsplash बाइबल-प्रचार

प्रचार के कुछ मूल सिद्धांत | Fundamental Principles of Preaching

हमारा आज का प्रचार यीशु मसीह के प्रचार का Continuation है. यीशु मसीह हमें इस जिम्मेदारी उत्तरदायित्व को सौंप दिया है. मरकुस 16:15, लूका 24:47-48 मत्ती 28:18-20

यीशु मसीह आज भी परमेश्वर के वचन के द्वारा कलीसिया से और कलीसिया के द्वारा दुनिया से बात करते हैं इसलिए वचन की सेवकाई को गम्भीरता से लेते हैं.

प्रचार में परमेश्वर का लिखित वचन उच्चरित वचन हो जाता है. और वह वचन के रूप में काम करता है और लोगो को परिवर्तित करता है.

यीशु का प्रचार

यीशु के प्रचार का सबसे मुख्य विषय “परमेश्वर का राज्य” Kingdom of God’ था. मरकुस 1:15, मत्ती 4:17 लूका 4:23

यीशु के प्रचार का दूसरा मुख्य विषय परमेश्वर की इच्छा था. (will of God). यीशु ने बाहरी धार्मिकता का विरोध किया और परमेश्वर की इच्छा को मानने की अपेक्षा की (मत्ती 6:10, 12:50, मरकुस 3:35 यूहन्ना 4:34, 5:30)

प्रारंभिक कलीसिया का प्रचार | Preaching of the early church

जब यीशु ने प्रचार किया था कि, परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है, मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो” (मरकुस 1:15) लेकिन जब चेलों ने प्रचार किया उन्होंने लोगों का मन फिराने को और यीशु मसीह पर विश्वास करने को निमन्त्रण दिया (प्रेरितों 2:14, 40, 16:41)

यीशु मसीह के स्वर्गारोहण के बाद चेलों ने यरूशलेम जाकर पवित्र आत्मा के आगमन की प्रतीक्षा की. और पवित्र आत्मा उन पर उतरने के बाद वे सामर्थ्य के साथ प्रचार करते रहे.

प्रचार का निर्माण | Sermon Construction | How do you write a sermon for beginners?

मूल पाठ / विषय वस्तु / लेख

अंग्रेजी शब्द (text) “टेक्स्ट एक लैटिन शब्द “टेक्स्टन” से आया है और उसका अर्थ यह है कि “सुनना” निर्माण करना, रचना करना.

मूल विषय / विषय वस्तु (Theme)

मूल पाठ जो विचार, प्रचारक ले आता है उसके मूल विषय (theme) कहते हैं. मूल विषय को एक शीर्षक के रूप में बता सकते हैं. मूल विषय की व्याख्या, एक विवरण देना ही प्रचार है.

मूल पाठ / विषय वाक्य का फायदा | Advantages of the Text)

  • प्रचारक को प्रचार करने के लिए एक आधार या नींव देता है.
  • प्रचारक को अपने प्रचार में प्रचार करते समय इधर उधर भटकने से बचाता है.
  • प्रचारक के संदेश को अधिकार का भाव देता है और सुनने वाले भी अपनी बाइबल खोलकर उस संदेश की वास्तविकता को देख सकते हैं.

मूल पाठ की बनावट | Structure of the TEXT

  • मूल पाठ TEXT पूर्ण वाक्य होना चाहिए.
  • अगर पूरा अर्थ (complete sense) देता है तो मूल पाठ आंशिक रूप में भी चुन सकते हैं.
  • मूल विषय (Theme) मूल पथ की लम्बाई का निर्णय करता है.

मूल पाठ को चुनना | Choosing of TEXT

कैसे हम मूल पाठ (TEXT) को चुनते हैं ?

कुछ लोग पहले मूल पाठ को चुन लेते हैं और इस में एक मूल विषय को ले आते हैं. लेकिन कुछ लोग पहले मूल विषय को चुन लेते हैं. और बाद में उसके अनुसार एक उचित मूल पाठ (TEXT) को चुन लेते हैं.

उदाहरण :-यूहन्ना 3:16-21– परमेश्वर का प्रेम, / इब्रानियों 11:8-22 –अब्राहम का विश्वास

स्थान या परिस्थित के अनुसार हमने मूल पाठ या (TEXT) को चुनना . मण्डली (Church / Congregation) के आवश्यकता के अनुसार भी हमें मूल पाठ को चुनना चाहिए.

मूल पाठ का प्रयोग | Treatment of the Text

मूल पाठ (TEXT) का प्रयोग आदर के साथ करना है, क्योंकि बाइबल परमेश्वर का वचन है. प्रचार के समय पूरा लेखांश (passage) पढ़ सकते हैं नहीं तो कुंजी मूलपाठ (Key TEXT) को भी पढ़ा जा सकता है.

मूल पाठ (TEXT) की व्याख्या देते समय प्रचार शास्त्र या व्याख्या शास्त्र (Hermeneutics) के नियमों का प्रयोग करना चाहिए. शब्दों का बुद्धिपूर्ण प्रयोग करना चाहिए. परमेश्वर के वचन को कोई गलत रीति से और गलत उद्देश्य से प्रयोग नहीं करना चाहिए.

मूल पाठ का प्रयोग कैसे कर सकते हैं ? | What are the 7 steps in preparing a sermon?

  1. बाइबल के अलग-अलग अनुवाद या भाषांतर को इस्तेमाल करें.
  2. अलग-अलग भाषाओं की बाइबल इस्तेमाल करें.
  3. टीका (Commentory), शब्दकोश (Dictionary) धर्मविज्ञान की किताबों, ऐसे अन्य साधनों (Tools/Aids) का इस्तेमाल करें.
  4. मूलपाठ (Text) को पढ़ते समय जो जानकारी / अंतरदृष्टी (Insights) मिलती है. उनको लिखते रहें.
  5. प्रचार के समय मूलपाठ (Text) के अंदर के शब्दों का इस्तेमाल करें.
  6. जल्दी में मूल पाठ (Text) को नहीं पढ़ें.
  7. मूलपाठ (Text) की घोषणा करते समय उसे स्पष्ट रूप से बताएं.

प्रचार का वर्गीकरण | Classification of Sermon

1. प्रासंगिक / विषयात्मक / शीर्षक प्रचार ( Topical, Thematical Preaching)

प्रासंगिक प्रचार में मूलपाठ (Text) से एक शीर्षक या विषय (Topic) को लिया जाता है और सिर्फ उस शीर्षक के आधार पर प्रचार किया जाता है. यहाँ सिर्फ मूल विषय (Theme) को महत्व दिया जाता है. और मूल पाठ (Text) के विशलेषण (Analysis) को महत्त्व नहीं दिया जाता.

यहाँ मूलपाठ को (Text) सिर्फ मूल विषय का (Theme) परिचय कराने के लिए उपयोग करते हैं. और उसके बाद मूलपाठ को छोड़ देते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो प्रसांगिक प्रचार में सिर्फ मूल पाठ के शीर्षक को महत्व देते हैं. और मूल पाठ के अंदर की आयतों को (verses) को महत्व नहीं दिया जाता है. उदाहरण :- (1) यूहन्ना 3:16 परमेश्वर का प्रेम (2) प्रेरितों 4:12 उद्धार (3) इब्रानियों 11:1 विश्वास.

प्रसांगिक प्रचार के फायदे | Advantages of Topical Preaching

  • अच्छे प्रसांगिक प्रचार बहुत ही प्रभावशाली होते हैं.
  • सुनने वालों को फायदा मिलने वाले विचार ले आने के लिए प्रचार को आजादी मिलती है. यहाँ प्रचारक मूल पाठ (Text) को शब्दों से ज्यादा सीमित नहीं होता है.
  • प्रचार को शुरू से अंत तक मूल विषय (Theme) पर केन्द्रित करने के लिए सहायता करता है.

प्रसांगिक प्रचार की कमी | Disadvantages of Topical Preaching

  • यहाँ प्रचार की वास्तविकता के बारे में सवाल उठ सकता है.
  • प्रचारक की आजादी भी हानिकारक हो सकता है, यहाँ प्रचारक बाइबल विषय से बढ़कर अपने ही विचारों को लाने की सम्भावना है.
  • प्रसांगिक प्रचार कभी-कभी वाचिक शाब्दिक (व्यर्थ बातें ) Verbal Chatting हो सकती है.

2. मूल पाठ / वाक्य आधारित प्रचार | Textual Preaching

मूल पाठ प्रचार को विश्लेषणात्मक प्रचार Analytical Preaching भी कहते हैं. यहाँ मूलपाठ प्रचार में पवित्रशास्त्र का ज्यादा उपयोग होता है. यहाँ मूलपाठ के अंदर के प्रमुख शब्दों को विश्लेषण दिया जाता है. प्रमुख शब्दों का विश्लेषण एक साथ मिलाने से मूल विषय बन जाता है.

मूल पाठ प्रचार में शब्दों का विस्तृत वर्णन या विवरण होता है. इसलिए सुशिक्षा के लिए (Edification) मूल प्रचार (वाक्य आधारित प्रचार) प्रासंगिक प्रचार से अच्छा है. उदाहरण : एज्रा, 7:10

प्रचारक की निपुणता (Skill) – मूल पाठ चुनने की और उसको विशलेषण करने की निपुणता.

3. व्याख्यात्मक प्रचार | Expository Preaching

प्रासंगिक प्रचार में सिर्फ मूल विषय (Theme) की व्याख्या होती है. और मूल पाठ प्रचार में मुख्य शब्दों का विश्लेषण दिया जाता है. लेकिन व्याख्यात्मक प्रचार स्वभाव में पूरी तरह से (Exclusively) व्याख्यात्मक है.

साधारण रूप में व्याख्यात्मक प्रचार में एक बड़ा मूलपाठ (Text) होता है. और उसमें एक मुख्य विषय और कुछ उप-विषय भी हो सकते हैं. जब उप-विषय भी प्रचार के साथ जुड़ जाते हैं तब प्रचार ज्यादा स्पष्ट हो जाता है.

सुनने वालों के लिए व्याख्यात्मक प्रचार ज्यादा लाभदायक है क्योंकि वह अनेक वाक्यों (verses) से भरा होता है. मसीह जीवन में बढ़ने का भी अवसर इस में ज्यादा है. यहाँ मूलपाठ के मुख्य विचारों से एक मूल विषय को ले आते हैं.

व्याख्यात्मक प्रचार करने के अलग-अलग तरीके

  1. एक पूरी पुस्तक या किताब को ले सकते हैं : उदाहरण : रूत, योना, फिलेमोन आदि को ले सकते हैं.
  2. एक जीवन चरित्र (बायोग्राफी) को भी ले सकते हैं. उदाहरण : दानिएल, युसुफ. को चुन सकते हैं.
  3. एक शब्द (Word) या एक वाक्यांश (Phrase) को चुन लेते हैं. और जहाँ-जहाँ वह शब्द या वाक्यांश मिलता है उनके बारे में फिर प्रचार करते हैं. उदाहरण : बाट जोहना, हियाव न छोड़ना आदि
  4. एक पूर्ण लेखांश (Comlete Passage) की व्याख्या कर सकते हैं.

व्याख्यात्मक प्रचार के फायदे | Advantages of Expository Preaching

  1. व्याख्यात्मक प्रचार बाइबल पर ज्यादा निर्भर हैं. इसलिए प्रचार के वास्तविकता के बारे में सवाल नहीं उठते हैं.
  2. मंडली या कलीसिया को यह प्रचार ज्यादा लाभदायक है क्योंकि वचन की सच्चाई को अच्छी तरह प्रस्तुत कर सकते हैं.

मूल पाठ – प्रासंगिक प्रचार (वाक्य आधारित -विषयात्मक प्रचार | Textual-Topical Preaching.

इन दिनों अनेक प्रचारक एक नए प्रकार के प्रचार का इस्तेमाल करते हैं जिसको मूलपाठ प्रासंगिक (वाक्य आधारित -विषयात्मक ) प्रचार कह सकते हैं. यहाँ मूल पाठ (Text) को भी महत्व देते हुए एक मूल विषय (Theme) के आधार पर प्रचार करते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो मूल विषय के साथ-साथ मूलपाठ के प्रमुख शब्दों का भी विश्लेषण किया जाता है.

प्रचार के प्रकार में चुनने में प्रभाव डालने वाले कुछ विषय.

  1. अवसर (Occasion) या स्थान (Situation): उदाहरण : बाइबल अध्ययन (Bible Study) – व्याख्यात्मक प्रचार उपाधिकरण (Graduation Service) – विषयात्मक (प्रासंगिक ) प्रचार सुसमाचार सभा (Gospel Meeting) – प्रासंगिक (विषयात्मक) प्रचार.
  2. जिस सभा (मण्डली ) को हम संबोधित करते हैं.
  3. चुना हुआ मूल विषय और मूल पाठ.
  4. प्रचारक का मानसिक स्वभाव (Mental Nature)

4. प्रचार के भाग | What are the three parts of a sermon?

एक अच्छे प्रचार में में तीन भाग होना चाहिए . (1) परिचय (introduction) (2) शरीर body (3) समापन conclusion

1. परिचय | introduction | How do you write a sermon title?

परिचय प्रचार का पहला कदम है इसलिए उसको अच्छी तरह तैयार करना और प्रस्तुत करना जरूरी है. एक कहावत है. First impression is the best impression. इसलिए Title को भी आकर्षित रखना आवश्यक है.

“Well Begin is Half Done”

Aristotle
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परिचयात्मक भाग में मूल पाठ की घोषणा की जाती और इसे पढ़ा जाता है. एवं फिर प्रचार की शुरुआत की जाती है.

“परिचय” का उद्देश्य व्याख्या देना नहीं है. परिचय सुनने वालों को मूलपाठ के निकट ले आता है. वह एक प्रवेश द्वार के समान है. वह श्रोताओं का ध्यान प्रचार की ओर आकर्षित करने के लिए मदद करता है. श्रोताओं को प्रचारक के पास आने के लिए भी परिचय मदद करता है.

“परिचय” अच्छी तरह से आयोजित करना (Planning) जरूरी है. “परिचय” छोटा होना चाहिए. प्रचार में परिचय का उपयोग सिर्फ इतना होना चाहिए कि वह श्रोताओं को विषय का परिचय दे सके.

परिचय स्वाभाविक (Natural) होना चाहिए. उसमें कुछ कृतिमता (Artificial) नहीं होनी चाहिए. लेकिन वह आकर्षित करने वाला होना चाहिए. अगर प्रचार के आरंभ में श्रोताओं का ध्यान नहीं मिलता है तो बाद में उनका ध्यान खींचना कठिन होता है.

2. शरीर (body) | How do you make a 3 point sermon?

शरीर प्रचार का मुख्य भाग होता है. मूल पाठ (Text) की व्याख्या और मूल विषय (Theme) का विकास यहाँ होता है. स्पष्टता के लिए शरीर में तीन बातें होनी चाहिए. पद का वर्णन (Explanation) दृष्टांत (Illustration) एवं इसे लागू करना (Application).

सुनने वालों को प्रचार याद रखने के लिए प्रचार को अलग-अलग बिन्दुओं (points) या भागों (Division) में विभाजन किया जाता है.

प्राचीन समय में प्रचारक लोग प्रचार को ज्यादा बिन्दुओं (10 से 20 बिन्दुओं) तक विभाजित करते थे. लेकिन आज कल बिन्दुओं का अंक (number) कम करके दो या तीन या ज्यादा से ज्यादा पांच तक रखते हैं. और चाहिए तो मुख्य बिन्दुओं के लिए उप बिंदु (sub-point) भी देते हैं. विभाजन स्पष्ट और संतुलित होना चाहिए.

प्रचार विभाजित करने के फायदे :

  • प्रचारक को अच्छी तरह भाषण देने के लिए मदद करता है.
  • मुख्य विचारों पर जोर (Emphasis) देने के लिए सहायता करता है.
  • सुनने वालों की अभिरुचि (Interest) बनाये रखने में मदद करता है.
  • प्रचार को ज्यादा समय तक याद रखने के लिए मदद करता है.

3. समापन / उपसंहार | Conclusion

प्रचार का अंतिम भाग है “उपसंहार (समापन) कब समाप्त करना है या प्रचारक को मालूम होना चाहिए. उप्स्नाह्र का उद्देश्य निष्कर्ष देना है न कि केवल समाप्त करना. (अंतिम प्रभाव स्थायी प्रभाव.)

“Last Impression is the Lasting Impression”

समापन (उपसंहार) में 3 चीजें होनी चाहिए.

  1. संक्षेप / संक्षिप्त (Recapituation) : प्रचार का सारांश बताना (Gist of the sermon) संक्षेप मुख्य विचारों को मजबूत बनाता है.
  2. प्रयोग /उपयोग / लागू करना (Application) : वचन की सच्चाई को लोगों पर उपयोग करना नहीं तो वचन की सच्चाई को श्रोताओं के सन्दर्भ में लाना. हर बिंदु के अंत में भी प्रयोग (Application) हो सकता है, लेकिन उपसंहार में लागुकरण जरूरी है.
  3. अपील अनुरोध (Appeal) : लोगों से एक उत्तर / जवाब माँगना . निर्णय लेने हेतु प्रेरित करना.

5. मूल पाठ की व्याख्या (अर्थ निर्णय ) | Exegesis Interpretation of the Text

बाइबल की व्याख्या देने की क्या जरूरत है ?

  1. बाइबल को अच्छी तरह से समझने और सीखने के लिए व्याख्या या (अर्थ निर्णय) जरुरी है.
  2. बाइबल को अच्छी तरह इस्तेमाल करने के लिए (Handle) करने के लिए व्याख्या (अर्थ निर्णय) आवश्यक है.
  3. बाइबल की बातों को जीवन में लागू करने के लिए भी व्याख्या (अर्थ निर्णय ) जरूरी है.

उदाहरण : पुराना नियम में एज्रा ने लोगों को इकट्टा करके परमेश्वर के वचन को पढ़कर उसका अर्थ समझा दिया (नहेम्याह 8:1-8). नए नियम में भी दो चेलों को जो इम्माउस नामक गाँव को जा रहे थे. यीशु ने उन्हें पवित्रशास्त्र में से अर्थ समझा दिया (लूका 24:13-27)

(प्रेरित 8:26-35) में भी अर्थ निर्णय का महत्व देख सकते हैं. यहाँ कूश देश के अधिकारी से फिलिप्पुस यह पूछता है, “तू जो पढ़ रहा है क्या उसे समझता भी है“? तब उसे अधिकारी यह जवाब देता है, जब तक कोई मुझे न समझाए तो मैं कैसे समझूं”? इन सारी बातों से बाइबल से व्याख्या देने की आवश्यकता एवं महत्व को हम समझ सकते हैं.

6. प्रचार की तैयारी (आयोजन) | Preparation of the Sermon

  1. रूपरेखा | How do you outline a Bible sermon?
    (a) प्रार्थना पूर्वक एक मूल पाठ / लेख (Text) को चुनना .
    (b) अपने मूल पाठ (Text) की सीमा को समझना (जो मूल पाठ चुन लिया है, वह अकेला खड़ा रह सकता है या वह दूसरे लेखांश का शेष है)
    (c) मूल पाठ (Text) के अंदर के मुख्य वाक्यांश ( Main Clause) को ढूंढ के निकालना.
    (d) मुख्य वाक्यांश से मूल विषय / विषय वस्तु (Theme) को ले आना.
    (e) अपने मुख्य विचार से संबध न रखने वाले विचारों को छोड़ देना.
  2. प्रयोग (लागुकरण) | Application
    मूल पाठ से हम क्या ले सकते हैं और सभा (मण्डली) की आवश्यकता से मूल पाठ को कैसे मिला सकते हैं. (सम्मिलित कर सकते हैं)

    (a) मूल पाठ की जीवन विन्यास (वातावरण ) को पुनरावलोकन (पुनर्विचार) करना. (Review the Life setting of the Text) पुनरावलोकन का मतलब है कि हम इस बात की खोज करें कि, किस सन्दर्भ में यह मूल पाठ लिया गया.

    क्योंकि हर मूल पाठ समय और सन्दर्भ / परिस्थिति से बहुत संबंध रखता है, इसलिए मूल पाठ के सही प्रयोग के लिए उस मूल पाठ के समय और सन्दर्भ को देखना जरूरी है. उसके लिए कुछ सवाल को हम पूछ सकते हैं.

    उदाहरण : इस मूलपाठ में किस बात या आवश्यकता का सबोधन किया गया है.

    (b) मूलपाठ की क्रिया / कार्य (Function) को समझना.
    अगर एक मूलपाठ को उसके मूल श्रोताओं के लिए किस उद्देश्य से लिखा गया करके समझ जाएं तो आज के श्रोताओं के जीवन विन्यास में उसको अच्छी तरह हम प्रयोग कर सकते हैं.

    एक मूल पाठ (Text) का संभावित उद्देश्य नीचे दिए गए में से एक हो सकता है.

(1) प्रेरणा दायक | (Motivation) उदाहरण : धन्य वचन (मत्ती 5:3-12), पौलुस की कुछ पत्रियाँ जैसे इफिसियों, कुरुन्थियों आदि.

(2) अपराध (गलती) स्वीकार कराना (Conviction) उदाहरण : मत्ती 5:21-47.

(3) सांत्वना देना और प्रोत्साहन करना : (Comforting and Encouraging) उदाहरण : धन्यवचन, 2 कुरुन्थियों 1:3-7, इब्रानियों की पत्री

(4) सुसमाचार की घोषणा करना ; उदाहरण प्रेरितों के काम में पाए जाने वाले प्रचार. (पौलुस का, पतरस का, स्तिफनुस का) पौलुस 13:16-47, 17:22-31, 20:18-35, 22:1-21. पतरस – 2:14-36, 3:11-26, 10:34-43, स्तिफनुस – 7:2-53,

(5) स्तुति और आराधना में अगुवाई देना : उदाहरण – भजन संहिता, प्रकाशितवाक्य 4:1, 5:14

(6) जीवन का आदर्श : (मानदंड) | standards – निश्चित करना. (नैतिक आदर्श बताना) उदाहरण : नीतिवचन, यीशु मसीह का पहाड़ी उपदेश, पासवानी पत्रियाँ (1 तीमुथियुस, 2 तीमुथियुस, तीतुस )

(7) शिक्षा और सिद्धांत (Teachings and Doctrines ) , उदाहरण : रोमियो की पत्री

मूल पाठ (Text) को लोगों की आवश्यकता पर कैसे प्रयोग कर सकते हैं?

मूलपाठ या (Text) की क्रिया (कार्य ) को लोगों की आवश्यकता के साथ मिलाया जा सकता है. दूसरे शब्दों में कहें तो मंडली की जिस आवश्यकता से मूलपाठ की मूल क्रिया मेल रखती है उसको खोजकर निकालना है.

मूल पाठ (Text) से परमेश्वर क्या संदेश देना चाहते हैं, यह प्रार्थना के साथ निर्णय करना. संदेश को एक ‘विषय’ से बढ़कर परमेश्वर के वचन की तरह मानना है. प्रचारक के संदेश के द्वारा परमेश्वर लोगों से बात करता है.

7. प्रचार की शैली | Style of the Sermon | Sermon preparation and delivery

एक प्रभावशाली प्रचार दो बातों पर निर्भर करता है.

पहला – हम क्या बताते हैं ( What we say)

दूसरा – हम इसे कैसे बताते हैं. (How we say )

“एक सन्देश 7% शब्दों से आता है, 38% आवाज या बोली से आता है और बाकी 55% चेहरे के भाव (Facial Expression), gasture and movment आदि से आता है”

अज्ञात विद्वान प्रचारक

शैली क्या है ? | What is the Style of sermon

जब बोली के द्वारा या लिखाई (रचना) के द्वारा एक व्यती अपने आप को विशेष रीति में प्रकट करता है, उस रीति या आचरण को शैली कहा जाता है. शैली हमारे स्वभाव का एक अनिवार्य भाग है.

शैली को कैसे सुधार सकते हैं ? | How Can improve the Style ?

  • भाषा (language) का अध्ययन करने से.
  • साहित्य (litrature) का अध्ययन करने से जैसे कहानी, कविता. आदि.
  • लिखने में और बोलने में ध्यान पूर्वक अभ्यास करने से.

शैली की शक्ति | Energy of Style

श्रोताओं का ध्यान आकर्षित करने लिए शक्ति की जरूरत हैं. शैली में शक्ति होनी चाहिए ताकि लोग प्रचार पर ध्यान दे सकें.

शैली की शक्ति अनेक बातों पर निर्भर होती है.

(1) प्रचारक का मनोवेग (जोस) (passion)

(2) प्रचारक का रचनात्मक स्वाभाव (Creative nature of the Preacher)

(3) दृढ विश्वास के साथ बोलना (Speaking with Strong Conviction)

(4) बाइबल की अच्छी जानकारी होना (Good understanding of the Scripture)

(5) प्रचार के विषय का महत्व समझना

(6) प्रचार में अलंकार का प्रयोग करना (उदाहरण:- रूपक, विश्मयादिबोधक, नाटकीकरण,

8. प्रचार और कल्पना शक्ति | Preaching and Imagination

प्रचार की बनावट में और भाषण देने में कल्पना शक्ति का एक महत्वपूर्ण स्थान है. प्रचारक को प्रचार बनाने में कल्पना शक्ति बहुत मदद करती है. कल्पना शक्ति तीन प्रकार से कार्य करती है.

(1) प्रचार का निर्माण :(रचना) (Construction)

(2) प्रचार को सुव्यवस्थित करना ( आयोजित करना) – (Organizing)

(3) प्रचार को आकार देना (रूप) – (Fashioning)

कल्पना शक्ति बढाने की उपाधियाँ :-

(1) प्रकृति से सम्पर्क रखना : यीशु मसीह ने कई दृष्टांत पृकृति से लिए हैं. उदाहरण : बीज बोने वाले का दृष्टांत, सुलेमान ने चीटियाँ, बिच्छू, छिपकली ऐसे जीवों का उदाहरण प्रकृति से लिया. हम भी प्रकृति से अच्छी तरह सम्पर्क रखने से और ध्यान देने के द्वारा अपनी कल्पना शक्ति बढ़ा सकते हैं.

(2) लोगों से सम्पर्क रखना :- एक प्रचारक यदि लोगों से प्रेम करता है, उनके साथ रहता है तो कल्पना शक्ति की कमी नहीं होगी.

(3) साहित्य का अध्ययन करना :- कल्पना शक्ति बढाने वाले साहित्य जैसे नाटक, उपन्यास , कविता, आदि पढ़ना.

(4) निरंतर अभ्यास करना : जो कुछ भी प्रचारक सीखता है उसे दर्पण या किसी व्यक्ति के सम्मुख अभ्यास करना लाभदायक होगा.

9. प्रचार और दृष्टांत | Preaching and Illustration

“दृष्टांत” प्रचार का एक विशेष भाग नहीं है लेकिन प्रचार में दृष्टांत का महत्वपूर्ण स्थान है. दृष्टांत की तुलना घर की खिड़कियों से की जाती है.

दृष्टांत के विविध उपयोग :-

(1) दृष्टांत का मुख्य उपयोग समझाना या स्पष्ट कराना है. उसके लिए उदाहरण या कहानी का उपयोग कर सकते हैं. कुछ लोग चित्रों का भी इस्तेमाल करते हैं.

(2) कुछ विचार या बिंदु को प्रमाणित करने के लिए (To Prove an Idea or a Point)

(3) प्रचार को आकर्षक और मनोहर बनाने के लिए लिए.

(4) श्रोताओं का ध्यान जगाने के लिए.

(5) प्रचार का पाठ या शिक्षा श्रोताओं को याद रहने के लिए.

दृष्टांत के स्त्रोत | Sources of Illustration

(1) निरिक्षण (observation) :- प्रकृति का,(राई, पेड़,चिड़िया) मानव जीवन का – (खेत, कटनी)

(2) कल्पना (imagination) : कल्पना के द्वारा दृष्टांत बना सकते हैं. उदाहरण- यीशु मसीह ने लूका 15:5 में दृष्टांत बनाया.

(3) इतिहास (History) :- पुराना इतिहास और अखबार समाचार पत्र से भी

(4) शास्त्र विज्ञान

(5) साहित्य और कला :- (literature and Art)

(6) बाइबल Bible

10. संदेश को कैसे प्रभाव के साथ पहुंचाया जा सकता है ?

(1) प्रचार के उद्देश्य या लक्ष्य (Goal – Purpose) को निर्णय करना

प्रचार की प्रेरणा क्या है, प्रचार के अंत में श्रोताओं को क्या मिलना चाहिए. ? या प्रचार के अंत में श्रोता को क्या चाहिए?

प्रचार के उद्देश्य को निर्णय करने के लिए कुछ कदम हैं

(a) एक उचित शीर्षक या विषय और मूल पाठ को चुन लेना.

(b) सुनने वालों के बारे में विश्लेषण करना (लोगों की साक्षरता, उनका अनुभव आदि को जान लेना.

(c) अवसर या समय को विश्लेषण करना. (उपवास प्रार्थना, जन्मदिन, मृत्यु,)

(d) प्रतिक्रिया का अनुमान लगाना.

(2) प्रचार की सामग्री को जमा करना और मूल्याकंन करना | Gather and Evalvate the material

बाइबल और किताबें [ टीका, {Commentary}, शब्दकोश {Dictionary}, अनुक्रमणिका {Concordance), अध्ययन बाइबल {study bible} आदि) पढने के द्वारा, निरिक्षण के द्वारा अनुभव के द्वारा आदि प्रचार की सामग्री को जमा कर सकता है. चुने हुए मूल पाठ के सावधानी पूर्वक अध्ययन द्वारा अपने विचारों को एकत्रित करना है.

(3) सन्दर्भ और श्रोताओं के अनुसार एक योजना को विकसित करना | Develop a Strategy

(4) प्रचार की सामग्री को बढ़ाना और सुव्यवस्थित करना

सुव्यवस्थित करने का मतलब है कि सब कुछ क्रम से आयोजित करना. (परिचय, शरीर और उपसंहार, सब कुछ क्रम में आयोजित करना.)

(5) स्पष्ट और उचित शब्दों का इस्तेमाल करना

(6) आवाज या बोली और शरीर का अभिनय को विकसित करना ( चाल {movement}, आँख सम्पर्क {Eye Contect}, स्वर {pitch}, विराम {Pavce} आदि बातों को विकसित करना ) आवाज में विविधता होनी चाहिए. बोलने का ढंग, तीव्रता एवं गति में बदलाव होना चाहिए. एक समान आवाज में न बोलें.

(7) अभ्यास करना (भाषण करके)

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