परमेश्वर-की-योजना

परमेश्वर की सिद्ध योजना क्या है? | God’s plan for your life sermon | Preaching

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परिचय :-

इससे पहले की उसे विश्वास और चमत्कार का व्यक्ति कहा गया, वह एक मृत जीवन जी रहा था. एक सभ्य और भक्त मसीही परिवार में पैदा होने के बावजूद उसका जीवन मसीही शिक्षा के अनुरूप नहीं था. वह वास्तव में कुछ था, और दर्शा रहा था कुछ और वह कलीसिया का एक भाग तो था, वो अपने जीवन में परमेश्वर की योजना को नहीं जानता था

तौभी परमेश्वर ने उसे ऐसा ही नहीं छोड़ दिया. परमेश्वर ने उसे एक नया जीवन दिया और इस कारण उसे विश्वास और चमत्कार का व्यक्ति कहा जाता है. वह व्यक्ति और कोई नहीं, वरन परमेश्वर के दास जॉर्ज मुल्लर हैं.

परमेश्वर-की-योजना
परमेश्वर-की-योजना

ऐसी परिस्थित हम इस्राएल देश में भी पाते हैं .- जहाँ वे लोग यहोवा परमेश्वर की प्रजा तो कहलाए जाते थे, परन्तु प्राय: वे परमेश्वर से दूर होकर रहते और अन्य देवी-देवताओं के पीछे भागते रहे. इस प्रकार वे लोग जीवन होते हुए भी मरे हुओं के समान थे.

इस परिस्थति में परमेश्वर ने उन्हें ऐसा ही नहीं छोड़ दिया, परन्तु उन्हें एक नया जीवन देना चाहा. वह बार-बार उन्हें अवसर देता रहा कि वे जीवन पाएं और उसके पास पुन: लौटे. इसका अर्थ है कि परमेश्वर की हमारे जीवन से एक योजना है. जिसे वह पूरा करना चाहते है. इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने आज के मनन का शीर्षक इस प्रकार रखा है.

परमेश्वर की हमारे जीवन से सिद्ध योजना क्या है?

हे मनुष्य की सन्तान, क्या ये हड्डियाँ जीवित हो सकती हैं ?” मैंने कहा, “हे परमेश्वर यहोवा, तू ही जानता है,”

यहेजकेल 37:1-14

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पारंपरिक रूप से यहेजकेल को इस पुस्तक का लेखक माना जाता है. यहेजकेल एक याजक था, जिसके नाम का अर्थ है, “परमेश्वर सामर्थ देता है.” यहेजकेल उन बड़े नबियों में से एक है जो बेबीलोन की बन्धुआइ में इस्राएलियों के बीच भविष्यवाणी की सेवकाई कर रहा था, जिससे कि लोगों का उत्साह बबढ़े और आशा न टूटे.

जैसे जैसे हम जानते हैं कि इस्राएली 586 ईस्वी पूर्व में 70 वर्षों के लिए बेबीलोन की बन्धुआइ में ले जाए गए. जहाँ पर उनकी दशा बहुत ही दयनीय हो गई थी. यरूशलेम के नाश किये जाने तथा लोगों को निर्वासन में ले जाए जाने से इस्राएल के राष्ट्रीय जीवन का अंत हो गया था.

इसे हमने जो बाइबल पद पढ़ा है वहां देखते हैं उनकी दशा सूखी हड्डियों के समान हो चुकी है. यहाँ परमेश्वर, इस्राएल को सूखी हड्डियों के रूप में संबोधित करता है जिनमें जान नहीं है, परन्तु परमेश्वर हार नहीं मानता और उनमें जीवन देना चाहता है. जिस प्रकार हमने देखा कि परमेश्वर की हमारे जीवन से एक सिद्ध योजना है. आइये हम इस अनुच्छेद के आधार पर देंखे कि वह सिद्ध योजना क्या है?

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1. परमेश्वर जीवन देने की चाहत रखता है (V. 1-6)

इन पदों में हम यहेजकेल को सूखी हड्डियों के समक्ष खड़ा हुआ पाते हैं. जहाँ हड्डियाँ ही हड्डियाँ हैं, जिनमें जीवन का एक अंश भी नहीं है. यशायाह नबी ने भी एक बार इस राष्ट्र को सड़े हुए घावो से भरा देखा (यशा 1:5-6 ) यह बीमारी पहले मृत्यु तक पहुंची, फिर विघटन और अब खुली हुई अस्थियों के बीच में यह घोर निराशा और असंभावना को उजागर कर रही है.

इस उपमा के द्वारा परमेश्वर यहेजकेल को इस्राएल की वास्तविक स्थिति जो इन सूखी हड्डियों के रूप में बताना चाहता है.

हड्डियों के लिए इब्रानी भाषा में जो शब्द प्रयोग किया है इसका अर्थ बहुदा गहनतम अर्थ में मैं स्वयं होता है (उत्त्पति 2:23 भजन 6:2,51:8) यानी यहाँ पर ये हड्डियां स्वयं इस्राएली लोग हैं. जिनकी हालत बहुत ही बुरी है. वे अब प्रतिज्ञा के देश में नहीं हैं, मन्दिर जो उनके जीवन का केंद्र था. वह भी उनके बीच न रहा.

सब जगह विनाश ही विनाश था. उजाड़पन और सूखापन उनकी जीवन की सुन्दरता बनकर रह गया. परन्तु ऐसा क्या हुआ जिससे वे इस स्थिति तक पहुँच गए? इसका कारण यह है कि उन्होंने अपने परमेश्वर यहोवा को त्याग दिया और उसके पीछे न चले.

वे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने से चूक गए जिसके कारण उन्हें बन्धुआइ में जाना पड़ा. उन्होंने परमेश्वर की आशीषों को खो दिया. अब वे मात्र सूखी हड्डियों के समान हो चुके हैं. जहाँ कुछ नहीं हो सकता. लेकिन परमेश्वर की स्तुति हो. जहाँ से कुछ नहीं हो सकता, परमेश्वर वहां से बहुत कुछ करना चाहता है.

तीसरे पद में परमेश्वर यहेजकेल से प्रश्न करता है, कि “क्या ये हड्डियां जी सकती है ? मनुष्य होने के नाते शायद यहेजकेल के अंदर प्रश्न रहा होगा कि इन सूखी हड्डियों में जीवन कैसे आ सकता है? देखिये वह किस प्रकार से जवाब देता है? “हे परमेश्वर यहोवा तू ही जानता है.

इब्रानी में तू ही जानता है पर अधिक जोर दिया गया है. याद रहे. यह उत्तर के रूप में यहेजकेल का इनकार नहीं, परन्तु उन दिनों में इस्राएल के विश्वास की सही अभिव्यक्ति थी. लेकिन वो कैसे? इस्राएली एक ऐसे परमेश्वर पर विश्वास करते थे जिसके पास जीवन देने और लेने दोनों का अधिकार था.

अत: यहेजकेल ने यही उत्तर महत्वपूर्ण समझा. “यहेजकेल से प्रश्न पूछने के द्वारा परमेश्वर कह रहा है कि यहेजकेल मैं चाहता हूँ कि उनमें फिर से जीवन आये. दूसरे शब्दों में परमेश्वर यह कह रहा है कि मैं मुर्दों का परमेश्वर नहीं, परन्तु जीवतों का परमेश्वर हूँ. मैं इनकी इस अवस्था से प्रसन्न नहीं हूँ.

मेरे प्रियो, यहाँ इस्राएली अपनी मृत दशा में है, जिसके जिम्मेदार वे स्वयं थे. लेकिन हमारे बारे में क्या? क्या आज हम भी अपने आत्मिक जीवन में मृत दशा में पड़े हैं? इस मृत दशा के कारण हो सकता है हम अपने जीवन में घोर निराशा से होकर जा रहे हों.

हमारा प्रभु के साथ संबंध टूट गया हो. आत्मिक उत्साह हमारे जीवन से बहुत दूर चला गया हो. आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती. हम जीवित दिखाई तो देते हैं परन्तु वास्तव में मृत हैं. मृत दशा में पहुँचने का कारण हम हैं, परमेश्वर नहीं. परमेश्वर हमसे आज्ञाकारिता की मांग करता हैं.

ताकी हम मृत अवस्था से बाहर आ जाएं. आज हमारे सामने वाही प्रश्न है जो यहेजकेल के सामने था. क्या हमारी मृत अवस्था में फिर से जीवन आ सकता है? हाँ ! अवश्य आ सकता है क्योंकि परमेश्वर की योजना हमने जीवन देने की है, न कि नाश करने की.

यीशु मसीह कहते हैं, “चोर और किसी काम के लिए नहीं, परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है ; मैं इसलिए आया कि वे जीवन पाएं और बहुतायत से पाएं “

(यूहन्ना 10:10)

प्रियों ! परमेश्वर इस मृत दशा से हमें निकालना चाहता है. परमेश्वर मुझको और आपको वहीँ पड़े नहीं रहने देगा. वह अवश्य ही अपना कार्य हमारे जीवन में करेगा. ताकि जिस जीवन की इच्छा वह करता है उसे दे भी. जैसे हम निर्गमन 3:7-10 में देखते हैं कि परमेश्वर न केवल मिश्र देश में पड़े इस्राएलियों के कष्ट और पीड़ाओं को देखा वरन, वह उन्हें छुड़ाने के लिए उतर भी आया.

अत: परमेश्वर न केवल हमें जीवन देने की इच्छा करता है बल्कि वह उस कार्य में कार्यरत भी है, यहाँ दूसरा बिंदु आता है –

2. परमेश्वर जीवन देने में क्रियाशील है और जीवन देता है (V. 7-10)

परमेश्वर के कार्य करने का तरीका मनुष्यों की सोच से परे हैं. वह अपना कार्य अपने तरीके से करता है, जिसे इंसान सोच भी नहीं सकता. 7वीं आयत में हम देखते हैं कि जब यहेजकेल भविष्यवाणी करना शुरू करता है. तब एक बड़ी आहट आई और भूकंप हुआ.

जिसके कारण ये हड्डियाँ बिखर सकती थी, परन्तु हम यहाँ पर क्या देखते हैं कि हड्डियाँ बिखकर दूर होने के बजाय आपस में जुड़ती चली गईं. ये ऐसी नहीं जुड़ गईं, परन्तु एक कर्म में जुड़ीं. जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने मनुष्य का रूप लिया.

प्रिय मित्रों! परमेश्वर जब किसी चीज को जोड़ता है तो वह वहीँ जुड़ती हैं जहाँ जुड़ना चाहिए. अर्थात जब परमेश्वर कार्य करता है तब वह अपनी सिद्धता में कार्य करता है. क्या आपने सुना है ? परन्तु मनुष्य धोखा खा सकता है. आज कलीसियाओं में संस्था और रीतिरिवाजों के नाम पर विभाजन ही विभाजन है. आपके और मेरे प्रयास उन्हें वास्तव में एक नहीं कर सकते, परन्तु जब यह कार्य परमेश्वर के हाथों में आ जाएगा तो कलीसिया का रूप ही कुछ और होगा.

परमेश्वर का काम यहीं समाप्त नहीं हुआ, जैसे उसने 5-6 वीं आयत में कहा था वह यहाँ कर भी रहा है. देखिये नसें उत्पन्न हो गईं, मांस भी चढ़ गया, और वे ऊपर चमड़े से ढंप गईं. यहाँ पर परमेश्वर अपनी इच्छा को कार्य रूप में बदल रहा है. परन्तु यहेजकेल यहाँ, आश्चर्य में है कि परमेश्वर ने उनमें सांस क्यों नहीं डाला?

हम परमेश्वर द्वारा किए जा रहे कार्य की तुलना उत्त्पति 2:7 में आदम की रचना से कर सकते हैं. जहाँ परमेश्वर ने मिटटी ली और आदम को रच दिया, परन्तु वह केवल पुतला ही था. उसमें जान नहीं थी. तब फिर परमेश्वर ने जीवन का स्वास फूंका और आदम जीवित प्राणी बन गया. उसी प्रकार यहेजकेल देखता है कि ये शरीर तो बन गए हैं परन्तु उनमें सांस नहीं है.

मूल इब्रानी में सांस और आत्मा के लिए एक ही शब्द “रूआख” प्रयोग हुआ है. इसका अर्थ होता है “हवा या सांस”. अत: इसका अर्थ मनुष्य की अंतरात्मा भी हो सकती हैं. इस शब्द से न केवल मनुष्य की आत्मा का बोध होता है, परन्तु इसमें परमेश्वर के प्राणवायु का भी बोध होता है.

अत: हम इसे जीवात्मा भी कह सकते हैं. इस प्रकार (बाइबल के विद्वान). बी. टेलर कहते हैं कि नबी यहेजकेल ने जिस शब्द का प्रयोग यहाँ किया है, उसका अर्थ बहुत ही व्यापक है. यहाँ पर परमेश्वर यह बताना चाहता हा कि जिस प्रकार एक शरीर सांस के बिना किसी अर्थ का नहीं उसी प्रकार परमेश्वर के बिना हमारा जीवन किसी अर्थ का नहीं है.

10वीं आयत में हम देखते हैं कि सांस आने पर उस ढाँचे में जीवन आ जाता है और एक बड़ी सेना के रूप में खड़े भी हो जाते हैं. यह कैसे हो पाया? यह केवल परमेश्वर के जीवन देने वाले कार्य के द्वारा ही संभव हो पाया. आज विज्ञान और तकनीकी अपनी ऊंचाइयों को छू रहा है, परन्तु वह मनुष्य में जीवन नहीं डाल सकता. सिवाय परमेश्वर के.

प्रिय मित्रों, हमें कलीसिया को, हमारे परिवार को हमारे देश को परमेश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन की आवश्यकता है. जो केवल उसी से संभव है. मुझे और आपको उसके आलावा और कोई नहीं सुधार सकता, केवल वही जिसने हमको बनाया है. सिर्फ इस बात की जरूरत है कि हम अपने आपको परमेश्वर के हाथों में दे दें. ताकि वह गूँथे, ढाले और बनाए और हमें जीवित करे. वह सभी बातों को सुव्यवस्थित करेगा, में दे दें. ताकि वह गूँथे, ढाले और बनाए और हमें जीवित करे.

वह सभी बातों को सुव्यवस्थित करेगा, जोड़ेगा और संवारेगा. ताकि सुधरे और सुव्यवस्थित ढाँचे में जीवन आ जाए. संभव है इस प्रक्रिया में समय लगे. पर फिर भी जीवन के लिए अपने आपको प्रभु के हाथों में देना जरूरी है, स्वयं का प्रयास, स्वयं की धार्मिकता निरर्थक है.

मनुष्य होने के नाते हम इस जीवन को खो भी सकते हैं, जो परमेश्वर हमें देता है. परमेश्वर इस बात का ध्यान रखता है कि, कहीं हम उस जीवन को खो न दें जो हमने उससे पाया है. इसलिए हमारा परमेश्वर न केवल जीवन देना चाहता है और जीवन देता है बल्कि हमें उसे जीवन में बनाए भी रखता है. अत: यहाँ तीसरा बिंदु आता है.

3. परमेश्वर जीवन को बनाए रखता है (V. 11-14)

11-14 पदों में परमेश्वर यहेजकेल के दर्शन का अर्थ स्पष्ट करते हैं. 11वीं आयत में पुन: उपरोक्त बातों को दोहराया गया है. जिसमें ये पद इस्राएलियों के विलाप के स्वरों को दर्शाते हैं. यहाँ 12वीं आयत में “कब्र” शब्द का प्रयोग किया गया है.

विद्वानों के बीच में मतभेद हैं कि ये बाद में जोड़े गए पद हैं क्योंकि हड्डियाँ तो मैदान में बिखरी हुई पड़ीं थी, जिन्हें गाड़ा नहीं गया था. परन्तु क्या बन्धुआइ में इस्राएली कब्र में रहने के समान नहीं हैं? जी हाँ! वे इस्राएल के परमेश्वर को नहीं जानते थे. क्योंकि यदि वे जानते तो उसकी आज्ञा मानते, उसकी विधियों के अनुसार जीवन बिताते और उन्हें बन्धुआइ में जाना न पड़ता.

अत: बन्धुआइ रूपी कब्र से बाहर निकालकर प्रतिज्ञा के देश में पहुंचाना उन्हें फिर एक बार उस छुटकारे को याद दिलाएगा. जिसे उनके पूर्वजों ने मिश्र की बन्धुआइ से परमेश्वर के द्वारा ही छुटकारा पाया था. तब वे जान पायेंगे कि वास्तव में यहोवा परमेश्वर कौन है? लेकिन इस जीवन की अवस्था को प्राप्त करने के बाद, इसका क्या आश्वासन है कि इस्राएली फिर से अनाज्ञाकारिता न करे, परमेश्वर के नाम को अपवित्र न करें और पुन: उसी सूखी हड्डियों की अवस्था तक न पहुचें.

इसलिए परमेश्वर 14वीं आयत में कहते हैं कि मैं तुम में अपना आत्मा समाऊंगा. अब प्रश्न यह उठता है कौन सा आत्मा? यहेजकेल 36:27 के अनुसार यह वह आत्मा है जिसमें आज्ञाएं और विधियाँ निहित हैं और इस आत्मा के अनुसार चलने के द्वारा परमेश्वर की आज्ञाओं और नियमों का पालन किया जा सकता है. यह वह आत्मा है जो आपको और मुझको बदल सकता है. चाहे हम अपने जीवन की कितनी ही बुरी दशा में क्यों न हों.

कैथरीन कूल्हमन : जो एक सामर्थी प्रभु की दासी थी. अपनी सेवकाई के दौरान शारीरिक अभिलाषाओं के कारण पाप में गिर गई. उसका जीवन मानो रुक सा गया था. परिणामस्वरूप सेवकाई में कोई सामर्थ नहीं, कोई छुटकारा नहीं. लेकिन जब पवित्रात्मा ने उसे स्पर्श किया तो उसका संपूर्ण जीवन ही बदल गया और अपनी मृत्यु तक वह जयवंत सामर्थी जीवन बिताती रहीं. जिससे वह परमेश्वर की महिमा का कारण बनी.

प्रिय मित्रों. पवित्रात्मा देने के पीछे परमेश्वर का लक्ष्य हमें बहुतायत का जीवन देना हैं. जो पवित्रात्मा के द्वारा आज्ञा मानने में छिपा है. यदि हम आज्ञा अनुसरण द्वारा अपने जीवन को बदलने में सफल हो गए. तो मानो हमारा जीवन एक नई सृष्टि बन जाएगा.

पवित्रात्मा मनुष्य के आचरण को ईश्वरीय आचरण में परिवर्तित कर परमेश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन को सर्वदा के लिए बनाए रखता है. जिससे हम सर्वदा के लिए परमेश्वर के साथ उसके निज स्थान अर्थात उसकी योजना में बने रह सकते हैं. अत: परमेश्वर न केवल कहता है, वह करता भी है और बनाए भी रखता है.

निष्कर्ष :

प्रभु में मेरे प्रिय मित्रों. आरंभ में हमारे सामने एक प्रश्न था कि “परमेश्वर की हमारे जीवन से सिद्ध योजना क्या है?” उपरोक्त वचन पर मनन करने के द्वारा हमने पाया है कि परमेश्वर हमें जीवन देने की चाहत रखता है. वह चाहता है कि हम जीवन पायें और उसकी यह चाहत निष्क्रिय नहीं है.

वह न केवल हमें जीवन देने की इच्छा रखता है, परन्तु हमें जीवन देने के लिए निरंतर क्रियाशील बना रहता है और हैं जीवन देता हैं. यह हो सकता है कि आज हम एक समझौता पूर्ण जीवन बिता रहे हों, निरंतर संघर्ष के बावजूद कोई सफलता हमारे हाथ न आई हो. अपने दोहरे जीवन से हम तंग आ चुके हों, अब कुछ नहीं हो सकता. मैं बदल नहीं सकता.

लेकिन प्रियो! यदि आज हम पवित्रात्मा को अपने जीवन में आमंत्रित करें तो वह आपको और मुझको पूर्ण रीति से बदल सकता है. परमेश्वर नहीं चाहता की हम उसके द्वारा दिए हुए जीवन को खोएं.

हमें जीवन देने की चाहत ने ही प्रभु यीशु को इस दुनिया में लेकर आया और यह केवल उसकी चाहत ही नहीं बनी रही, परन्तु अपने बलिदान रूपी कार्य के द्वारा उसने हमें यह जीवन दिया भी. जब प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर के पास लौटे तो वे जाते जाते हमें अपना पवित्रात्मा देकर गए.

जिससे हम इस अमूल्य जीवन को खो न दें, परन्तु इसमें बने रहें, और उस अनश्वर और अनंत जीवन के भी वारिस हो जाएं. इस हेतु परमेश्वर ने हमें पवित्रात्मा दिया है.

“पवित्रात्मा से परिपूर्ण रहो अर्थात पवित्रात्मा को सोख लो. इतना भीग जाओ कि आपके जीवन का हर पहलु पवित्रात्मा के रंग में रंग जाए. यदि कोई तुम्हें निचोड़े या तुमसे दुर्व्यवहार करे, तो तुम में से केवल मसीह का स्वभाव ही बाहर टपकेगा.”

शरद बागरे


हाँ, एक ऐसा ही जीवन परमेश्वर हमें देना चाहता है. चुनाव हमारे समक्ष है कि क्या हम उसकी सिद्ध योजना के लिए अपने जीवन को उसके हाथों में देना चाहेंगे….???

प्रार्थना :

परमेश्वर हम बड़ी दीनता के साथ आपके चरणों में आते हैं, पवित्रात्मा में चलने और जीवन जीने में हमारी मदद करें प्रभु यीशु के उद्धारकारी नाम से मांगते हैं… आमेन.

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  • धन्यवाद: पास्टर शरद बागरे जी (लेखक/प्रचारक)
  • निवास : मंडला (मध्यप्रदेश)
  • कार्य क्षेत्र: Founder President of “जीवन मोक्ष सेवा”
  • शिक्षा: M.A, B.A. in English and B.Th.
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  • इमेल : [email protected]


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