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प्रभावशाली पास्टर बनने के तरीके | पास्टर का जीवन और सेवकाई | How to Become A Effective Pastor In Hindi

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एक पास्टर या मसीही सेवक कौन है ?

परिभाषा : – एक पास्टर या मसीही व्यक्ति वो है, जिसे मसीह के कार्य को करने की विशेष बुलाहट मिली है. वैसे तो हर एक विश्वासी मसीह का सेवक है, पर परमेश्वर कुछ लोगों को अपने कार्य करने लिए विशेष बुलाहट देता हैं.

हमें यह बुलाहट परमेश्वर के अनुग्रह से मिलती है (2 कुरुन्थियों 4:1) यह हमारा सौभाग्य है कि परमेश्वर ने हमें अपनी सेवा के लिए चुना है.

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पास्टर होने के लिए विशेष बुलाहट : Separation for His Ministry

मसीही सेवा के लिए परमेश्वर की ओर से एक स्पष्ट बुलाहट होना अति आवश्यक है. आज मसीह समाज में कई लोग हैं जो बिना किसी बुलाहट के मसीह सेवा में हैं. वे लोग अलग अलग उद्देश्यों के कारण प्रभु की सेवा में हैं. उदाहरण : पैसे के लिए. किसी के दबाव से, नौकरी न मिलने के कारण.

पुराने नियम में लोगों के जीवन में परमेश्वर की बुलाहट.

अब्राहम (उत्पत्ति 12:1-4)

मूसा (निर्गमन 3:1-10)

यहोशु (यहोशु 1:1-9)

शमुएल (1 शमुएल 3:1-10)

दाउद ( (1 शमुएल 16:1-13)

एलिशा (1राजा 19:21)

यिर्मयाह (यिर्मयाह 1:1-19)

यहेजकेल (2:1-8)

नए नियम में बुलाहट :

चेलों की बुलाहट (मत्ती 4:18-20; 9:9)

पौलुस की बुलाहट (प्रेरितों के काम 13:2)

पास्टर बनने के लिए परमेश्वर की बुलाहट को कैसे पहचाने ?

  • परमेश्वर हमारे मनों में परमेश्वर की सेवा करने के लिए एक तीव्र इच्छा या बोझ देता है.
  • परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमसे बातें करता है.
  • परमेश्वर अपने लोगों के द्वारा जैसे भविष्यवक्ता के द्वारा भी बातें करता है.

सेवा के प्रकार (इफिसियों 4:11-13) Type of Ministries in The Church.

  1. प्रेरित की सेवा
  2. भविष्यवक्ता की सेवा
  3. सुसमाचार प्रचारक की सेवा
  4. पासवान या पास्टर की सेवा
  5. शिक्षा देने की सेवा

पास्टर का जीवन और सेवकाई

एक पादरी या मसीही सेवक परमेश्वर के द्वारा अपने सेवा के लिए अलग किया गया व्यक्ति है, उसे अपने जीवन व कार्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए (1 तिमु 4:16)

वह अपने कार्य को अच्छे ढंग से करे उसके लिए उसे अपने जीवन की विशेष परवाह करनी चाहिए. मसीही सेवक के जीवन व कार्य को हम अलग-अलग नहीं कर सकते ये दोनों ही एक साथ चलते हैं.

एक सच्चे पास्टर या मसीही सेवक में निम्नलिखित गुण होने चाहिए.

उसका दिल प्रेम से भरा हुआ हो (2 कुरु 5:14, 1 कुरु 13:2, रोमी 5:5)

एक मसीही सेवक अपने सेवा क्षेत्र में बहुत प्रेम के प्रचार करता, सिखाता व गीत गाता है, पर यदि वह इस गुण को अपने व्यवहारिक जीवन में लागू न करे तो वह सेवा क्षेत्र में ज्यादा समय तक सेवा नहीं कर सकता, प्रेम एक मसीही सेवक का अनिवार्य गुण है. मसीही का प्रेम ही हमें सेवा के लिए विवश करना चाहिए. (2 कुरु.5:14)

पढ़ें : हम यीशु मसीह के चेले हैं

“God’s mission without God’s love would be no mission at all”

Ken Gnanakan

यह परमेश्वर का प्रेम ही था जिसने प्रथम मिशनरी यीशु मसीह को दुनिया में भेजा.

दो महान आज्ञाएं :- (मत्ती 22:37-40)

  1. प्रभु के प्रति सर्वोच्च प्रेम :- (Love for the Lord) मसीही सेवक सबसे पहले एक मसीही चेला है, बाइबिल कहती है उस सेवक को अपने प्रभु के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखना है (मत्ती 10:37,38 मर 3:13-14) क्योंकि स्वयं से प्रेम सेवकाई में एक बड़ी रुकावट है.
  2. स्थानीय लोगों के प्रति प्रेम :-(Love for the Local people) एक मसीही सेवक को उन लोगों से प्रेम करने के लिए बुलाया गया है, जिनके बीच में वह सेवा करता है. अनेक मसीही सेवक लोगों से प्रेम करने में कठनाई महसूस करते हैं. क्योंकि वे उनसे बिलकुल भिन्न हैं. पर एक मसीही सेवक को लोगों की भिन्नता, अज्ञानता व विश्वासघात के बाद भी प्रेम करना चाहिए.

इस प्रकार के प्रेम करने के लिए अनेकों प्रकार का त्याग व बलिदान करना पड़ेगा. मानसिक, शारीरिक और आत्मिक कष्टों से गुजरना पड़ेगा ताकि लोग सुसमाचार को सुन सकें.

एक मसीही सेवक को सेवा में सफल होने के लिए बहुत बुद्धिमान व बहादुर होने से ज्यादा उसे एक प्रेमी हृदय रखने की आवश्यकता है. लोगों की कमियों और गलतियों एवं पापों के बावजूद भी उनसे प्रेम करने वाला हो.

3. अन्य मसीही सेवकों से प्रेम :- (Love for the Co-missionaries) कुछ मसीही सेवक स्थानीय लोगों से तो प्रेम करते हैं पर अपने साथ काम करने वाले मसीही सेवकों से और प्रचारकों से प्रेम नहीं करते. उनका साथ नहीं देते, उनसे ईर्ष्या रखते हैं, परिणामस्वरूप वे स्थानीय लोगों का भी विश्वास खो देते हैं.

यदि हम प्रेम के चलाए चलते हैं तो निम्न बातें हमारे जीवन में होनी चाहिए.

हम एकता के साथ काम करें : विभाजन एक सफल सेवकाई की सबसे बड़ी रुकावट है. मसीहियों में विभाजन बाहर के विरोध से भी ज्यादा व खतरनाक है. – अगर एक टीम को खेल में जीतना है तो उसमें एकता होना जरूरी हैं.

अनेकता या विभाजन के कई कारण हो सकते हैं: घमंड, या दूसरों के योग्याताओं के कारण जलन, सिद्धांतों को लेकर झगड़ा आदि.

हम एक दूसरे का साथ दें : आज बहुत से मसीही सेवक दुसरे सेवकों की सेवा में साथ नहीं देते उनके काम की निंदा करते हैं. हमको तो क्षमा करने वाले होना चाहिए.

एक पास्टर को सम्पूर्ण समर्पण करना होगा (Full Commitment is Needed) (रोमियो 12:1)

मसीही सेवा के लिए एक सम्पूर्ण समर्पण की अत्यंत आवश्यकता है. इसका मतलब है हम किसी भी कीमत पर उसकी इच्छा को पूरी करने के लिए तैयार हैं. इसका अर्थ है कि यीशु ही हमारे जीवन के हरेक पहलुओं का स्वामी है.

समर्पण के विभिन्न क्षेत्र

  • परमेश्वर के प्रति समर्पण
  • परिवार के प्रति समर्पण
  • अपनी बुलाहट के प्रति समर्पण
  • अपने कार्य या सेवकाई के प्रति समर्पण
  • अपनी कलीसिया व मिशन क्षेत्र के प्रति समर्पण

एक पास्टर का परमेश्वर के प्रति समर्पण

परमेश्वर के प्रति समर्पण का अर्थ है खुद को खाली कर देना और पवित्रात्मा को हमें हमारे जीवन को चलाने के लिए आमंत्रित करना. पवित्रात्मा कभी भी जबरन या जबरदस्ती हमारे जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता. हमें उसे अनुमति देना होता है. कि वह हमारे ऊप अपना कब्जा करे. यह एक दीन में होने वाला काम नहीं है. हमें प्रति दिन उसे अपने जीवन का नियन्त्रण देना होगा.

पौलुस प्रेरित अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की वेदी पर रखने का आग्रह करता है (रोमियो 12:1-2) सम्पूर्ण समर्पण का अर्थ है परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए खुद को दे देना.

सम्पूर्ण समर्पण हमें पवित्रात्मा से भरपूरी की ओर ले जाएगा. कोई भी मसीही सेवक जो आत्मा से भरा नहीं है परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता.

सम्पूर्ण समर्पण का मतलब है खुद के लिए मर जाना और परमेश्वर के लिए जीना (लूका 9:23, गला. 2:20) परमेश्वर ऐसे लोगों को खोज रहा है जो पूर्ण रूप से परमेश्वर के प्रति समर्पित हों (2 इतिहास 16:9)

एक सेवक का अपने परिवार के प्रति समर्पण

परिवार समाज की एक महत्वपूर्ण इकाई है इसलिए एक मसीही सेवक व सेविका को अपने परिवार का बहुत ध्यान देना चाहिए. दोनों पति-पत्नी को अपने परिवार को बनाने का भरसक प्रयास करना चाहिए. पति पत्नी को एक दूसरे को गहराई से प्रेम करना चाहिए.

कुछ महत्वपूर्ण बातें :

  • एक सेवक का अपने परिवार के प्रति समर्पण उसकी सेवा व बुलाहट से पहले आना चाहिए. पति-पत्नी का रिश्ता विवाह में ली गई शपथों व कसमों पर आधारित होना चाहिए न कि सेवकाई के प्रति समर्पण पर.
  • पति पत्नी को एक दूसरे की बुलाहट का आदर करना चाहिए. यह अच्छा है कि दोनों प्रभु की सेवा के लिए बुलाये गए हों पर हमेशा ऐसा होता नहीं . उदाहरण के लिए : पति एक डॉक्टर हो सकता है, पर पत्नी एक शिक्षक. फिर भी दोनों ख़ुशी ख़ुशी साथ रह सकते हैं अगर एक दूसरे की बुलाहट व समर्पण का आदर करें.
  • शैतान परिवार को नाश कर सेवा को नाश करना चाहता है . गलत फहमी, शक करना, अनैतिक जीवन कुछ ऐसे हथियार हैं जिन्हें शैतान परिवार को नाश करने के लिए इस्तेमाल करता है. दोनों पति पत्नी को इन खतरों से बचने के लिए निरंतर प्रार्थना, एक दुसरे के साथ अपने जीवन की बातों को बांटना तथा आत्मिक परिपक्वता की आवश्यकता है.
  • सेवा की सफलता निश्चित रूप से परिवार की सफलता पर निर्भर है. इसलिए दोनों पति पत्नी एक दूसरे के प्रति बच्चों व परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति समर्पित हों.

एक पास्टर का अपनी बुलाहट के प्रति समर्पण:

प्रत्येक सेवक को अपनी बुलाहट की निश्चितता होना अनिवार्य है. सेवा में प्रवेश करने से पहले प्रत्यके सेवक को यह पक्का कर लेना चाहिए. क्योंकि सताव, तनाव व समस्याओं में परमेश्वर ने उसे बुलाया है यही बात उसको आगे बढ़ते रहने में मदद करेगी.

पुराने नियम में हम पढ़ते हैं कि नहेम्याह अपनी बुलाहट के प्रति पक्का था. जैसे ही उसने सूना की यरूशलेम की शहरपनाह टूटी पड़ी है वह उसे बनाने के लिए उठ खड़ा हुआ. वह जानता था कि परमेश्वर ने उसे दीवार बनाने के लिए बुलाया है. (नहेम्याह 2:17)

पौलुस भी अपनी बुलाहट के प्रति विश्वस्त था, वह पूर्ण रीती से जानता था कि परमेश्वर ने उसे अन्य जातियों को सुसमाचार सुनाने के ले बुलाया है. (प्रेरितों के काम 22:21)

हरेक सेवक को किस प्रकार की सेवा की बुलाहट है और परमेश्वर ने उसे क्या क्या दान वरदान दिया हिया यह भी जानना आवश्यक है.

एक सेवक को अपनी बुलाहट के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहे उसे अपनी बुलाहट से पीछे नहीं हटना चाहिए क्योंकि जो ऐसा करते हैं वो उसके राज्य के लायक नहीं है.

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एक पास्टर का अपनी सेवकाई के प्रति समर्पण

एक पास्टर को अपना कार्य पुरे दिल से करना चाहे उसे अपने कार्य में निपुण होने व सर्वोत्तम करने के लिए प्रयास करना चाहिए उस एआलसी नहीं होना चाहे. चाहे काम छोटा हो या बड़ा एक सेवक को उसे पुरी लग्न व ईमानदारी से करना चाहे. क्योंकि हम जो कुछ करते हैं वो मनुष्यों के लिए नहीं बल्कि परमेश्वर के लिए करते हैं (कुलुस्सियों 3:23-24)

हर सेवक का लक्ष्य होना चाहिए कि वो सेवा के प्रति ईमानदार हो. कई सेवा क्षेत्रों में निरिक्षण करने के लिए कोई नहीं होता ऐसी दशा में सेवकों के सम्मुख आलसी व बेईमान बनने का खतरा पैदा हो जाता है. जब उसे कोई नहीं देखता है ऐसे में कई बार सेवक इमानदारी के साथ समझौता कर सकते हैं.

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पास्टर के जीवन में आत्मिक अनुशासन | Spiritual Disciplines

आज मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक व तकनिकी की नहीं है वरन नैतिक व आत्मिक है. आज संसार एक आत्मिक व नैतिक संकट से गुजर रहा है. ऐसी स्थिति में कलीसिया को पृथ्वी का नमक व जगत कीज्योति बनकर बुलाया गया है.

सेवा के क्षेत्र में एक मसीह सेवक से अपेक्षा की जाती है कि जिस समाज में वह रहता है उसे मसीह के लिए प्रभावित करे. उन लोगों की मदद करे जो नैतिक व आत्मिक समस्याओं से गुजर रहे हैं . यह तभी हो सकता है जब एक मसीह पवित्र आत्मा से भरा हो. एक मसीह सेवक को दूसरे की मदद करने से पहले खुद को अनुशासित करना पड़ेगा.

अनुशासन के विभिन्न क्षेत्र :

  1. वचन पढ़ने में अनुशासन : एक मसीह व्यक्ति (सेवक) को वचन पढ़ने में खुद को अनुशासित करना चाहिए. उसे नए जन्में बच्चे के समान इस आत्मिक दूध की लालसा करनी चाहिए. (1 पतरस 2:2) उसे वचन को उस प्रकार चबाना चाहिए जैसे एक गए जुगाली करती है (यहोशु 1:8, भजन 1:2)

एक सेवक वचन मनन करने में जितना ज्यादा अनुशाषित होता है उतना ही अधिक उसका आत्मिक जीवन मजबूत होता जाएगा. (कुलु 3:16) मसीह का वचन उस दिशा सूचक के समान है, जो भटके हुए लोगों को राह दिखाता है.

मसीह का वचन हमें पाप करने से भी बचाता है. (भजन 119:9,11) मसीह का वचन यदि हममे बना रहे तो हम परमेश्वर में बने रहते हैं (यूहन्ना 15:4, 7) मसीह का वचन विश्वास में मजबूत बनाता है (रोमी10:17)

2. आराधना करने में अनुशासन : प्रत्येक मसीह सेवक को परमेश्वर की आराधना करने का अनुशासन डालना चाहिए. यदि हम गम्भीरता से वचन का अध्ययन करते हैं तो यह हमें आराधना की ओर ले जाएगा. आराधना में हम परमेश्वर की स्तुति प्रसंसा व् धन्यवाद करते हैं.

हम परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं , हम परमेश्वर का धन्यवाद उसके किये गए कामों के लिए करते हैं तथा हम उसकी स्तुति “परमेश्वर जो स्वयं है” उसके लिए करते हैं (भजन 34:1)

आराधना के मुख्य अंग :

  • A – Adoration – स्तुति प्रशंसा
  • C – Confession – अंगीकार
  • T – Thanksgiving – धन्यवाद देना
  • S – Supplication – प्रार्थना विनती

आत्मा व सच्चाई से की जाने वाली आराधना परमेश्वर के हृदय को छूती है, हम परमेश्वर की आराधना डर के कारण नहीं बल्कि परमेश्वर के प्रति प्रेम के कारण करते हैं. और हमें यह आज्ञा भी मिली है, कि हम केवल उसी की आराधना करें (मत्ती 4:10)

प्रार्थना करने में अनुशासन : प्रार्थना एक मसीही सेवक की स्वास होनी चाहिए. बिना प्रार्थना के कोई भी मसीही कार्य सफल नहीं हो सकता. प्रार्थना सेवा कार्य की रीड की हड्डी के समान है. प्रभु यीशु प्रार्थना का एक जीता जागता उदाहरण है. वे सुबह तड़के प्रार्थना करते थे.

प्रभु यीशु ने हरेक प्रमुख निर्णयों को करने से पहले प्रार्थना की.

  • सेवा शुरू करने से पहले प्रार्थना की (मत्ती 4:1-2)
  • चेलों को चुनने से पहले प्रार्थना की (लूका 6:12-13)
  • क्रूस की पीड़ा सहने से पहले (मर. 14:32-42)

परमेश्वर के जितने भी महान दास हुए सबकी सफलता के पीछे प्रार्थना की सामर्थ थी. हडसन टेलर जो चीन में मिशनरी होकर गए उसके सम्बन्ध में ऐसा कहा जाता है, पचास साल के सेवा काल में हडसन टेलर के लिए सूर्य तब तक नहीं उगा, जब तक उसने हडसन टेलर को घुटनों पर नहीं पाया.

मध्यस्थता की प्रार्थना: मध्यस्थता की प्रार्थना मिशन कार्य में एक बहुत ही सामर्थी हथियार है . यीशु ने आने चेलों से प्रार्थना करने को कहा (मत्ती 9:3) पौलुस प्रेरित ने मध्यस्थता की प्रार्थना की सामर्थ को पहचाना इस कारण उसने इफिसियों को लिखा की उसके लिए प्रार्थना करें.

उपवास के साथ प्रार्थना में अनुशासन : उपवास के साथ की गयी प्रार्थना बहुत प्रभावशाली होती है. यीशु ने खुद भी उपवास के साथ प्रार्थना की. कई बार कुछ आत्मिक समस्याओं पर जय पाने के लिए उपवास प्रार्थना की आवश्यकता होती है (मर 9:29)

शरीर को चुस्त व तंदरुस्त रखने के लिए अनुशासन : हमारा यह शरीर पवित्रात्मा का मन्दिर है जिसे हम स्वस्थ व साफ व तन्दुरुस्त रखने के लिए हर सम्भव प्रयास करने चाहिए. (1 कुरु 6:19, 20) मसीह न केवल हमारे आत्मा के लिए बलिदान दिया बल्कि हमारे शरीरों के लिए भी बलिदान हुआ.

दिमाग के प्रति अनुशासन : एक मसीही सेवक को अपने दिमाग को अनुशासित करना चाहे इसमें बुरे व गंदे विचारों को जगह नहीं देनी चाहिए. (रोमी 12:2) मसीही सेवक को अपने दिमाग को पवित्र व अच्छी बातों से भरना चाहिए (फ़िलि 4:8)

सोने और खाने की आदत संबंधी अनुशासन: हम जीने के लिए खाते हैं, खाने के लिए नहीं जीते हैं, पौलुस कहते हैं “भोजन पेट के लिए है, पेट भोजन के लिए नहीं, (1 कुरु) हमें अपनी खाने पीने की आदतों में अनुशासन करना चाहिए.

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